दवा या अंधविश्वास ? हर मर्ज की एक ही दवा चिड़ी दाग़ !

जमशेदपुरः आदिवासी समाज में आज भी कई ऐसी अनोखी अस्तित्व में हैं, जो आम लोगों की समझ से परे है। इसपर ना तो विज्ञान भरोसा करता है और ना ही मेडिकल साइंस। ऐसी परंपराओं को अंधविश्वास बताया जाता है लेकिन जमशेदपुर के आदिवासियों में इसके प्रति गहरा विश्वास है।

झारखण्ड में प्रकृति की पूजा करने वाले आदिवासी समाज के लिए मकर संक्रांति एक बड़ा पर्व है। इस पर्व को मनाने के लिए ग्रामीण एक माह पूर्व से ही तैयारी करना शुरु कर कर देते है।

मकर के दूसरे दिन लगता है अखंड जतरा

घरों में तरह-तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं वहीं मकर के दूसरे दिन को अखंड जतरा कहा जाता है जिसमें चीख और दर्द भरी परम्परा को निभाते है। जिसमें 21 दिन के नवजात बच्चे से लेकर बड़े तक को गर्म सीक से पेट में दागा जाता है जिसे चिड़ी दाग़ कहा जाता है।

दवा 2 22Scope News

आदिवासी समाज में मकर के दूसरे दिन को अखंड जातरा कहते है। इस दिन गांव में अलग-अलग इलाके में अहले सुबह पुरोहित के घर आस-पास की महिलाएं गोद में अपने बच्चे को लेकर पहुंचती है। पुरोहित के घर के आँगन में लकड़ी की आग में पुरोहित पतली ताम्बे की सिक को गर्म कर उसे तपाता है।

महिलाएं अपने बच्चे को पुरोहित के हवाले कर देती है

महिलाएं अपने बच्चे को पुरोहित के हवाले कर देती है। पुरोहित महिला से उसके गांव का पता और बच्चे का नाम पूछकर ध्यान लगाकर पूजा करता है और वहीं मिट्टी की ज़मीन पर सरसो तेल से एक दाग़ देता है और फिर बच्चे के पेट के नाभि के चारो तरफ तेल लगाकर तपते ताम्बे की सिक से नाभि के चारो तरफ चार बार दागता है।

इस दौरान पूरे माहौल में चीख गूंजती है लेकिन पुरोहित बच्चे के सर पर हाथ रख उसे आशीर्वाद देता है और उसकी माँ को सौंप देता है। पुरोहित बताते है कि यह उनकी पुरानी परम्परा है। उनके परदादा, दादा, पिता के बाद आज वो इसे निभा रहे हैं।

चिड़ी दाग़ देने से पेट दर्द और बुखार ठीक हो जाता है

यह माना जाता है की मकर में कई तरह के व्यंजन खाने के बाद पेट दर्द या तबियत खराब हो जाता है। चिड़ी दाग़ देने से ऊपर से नस का इलाज होता है और पेट दर्द सब ठीक हो जाता है। 21 दिन के नवजात बच्चे से लेकर बड़े बुजुर्ग भी चिड़ी दाग़ लेते है।

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बच्चे को चिड़ी दाग़ देने के बाद माँ को इस बात की ख़ुशी होती है कि उसके बच्चे को अब पेट से सम्बन्धित कोई तकलीफ नहीं होगी वो अपने बच्चे को गोद में लेकर ख़ुशी-ख़ुशी लौट जाती है। महिलाओं का कहना है हम अपनी इस पुरानी परम्परा को मानते है बच्चा रोता है लेकिन वो थोड़ी देर बाद शांत हो जाएगा।

पर यहां सवाल उठता है कि क्या सच में दर्द के बीच कोई राहत है, क्या इस राहत के चलते मां अपने बच्चों की पीड़ा बर्दाश्त कर लेती है या फिर यह सिर्फ अंधविश्वास मात्र है।

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