गया के कौवाडोल पहाड़. साधारण सा दिखने वाला ये पहाड़, अन्य पहाड़ों की तुलना में बिल्कुल अलग है। घाटी के बीच सीना ताने खड़ा ये पहाड़ भारतीय इतिहास का एक अध्याय है। पहाड़ और चट्टानों पर उकेरी गयी देवी-देवताओं की मूर्तियां और जगह जगह यूं ही पड़े मंदिर के खंभे इस पहाड़ की विरासत की गाथा का बयां करती है। गया शहर से 30 किलोमीटर दूर बेलागंज में मौजूद कौवाडोल नाम से एक ये वही पहाड़ है, जिससे ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताएं जुड़ी है। 1902 के पास इस पहाड़ पर ऐसी घटना हुई, जिससे इस पहाड़ का नाम कौवा डोल पहाड़ पड़ गया।
इस वजह से नाम पड़ा कौवाडोल पहाड़
कहा जाता है कि, 1811 में इस्ट इंडिया कंपनी ने इस पहाड़ी का निरीक्षण किया था। ब्रिटिश वैज्ञानिक फ्रांसिस बुकानन इस पहाड़ पर पहुंचे थे, लेकिन 1902 में जब पुरातत्वविद मेजर किष्टी, ब्रिटिश इंजनीयर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम और अर्मेनियाई-भारतीय इंजीनियर जोसेफ डेविड बेगलर इस पहाड़ी पर पहुंचे तो पहाड़ के खोह से कौवों का झुंड निकलने लगा और चोटी पर जा बैठा। जिस पत्थर पर ये कौवा बैठा। वो हिलने लगा। कई बार बैठने और उठने से पत्थर हिला, लेकिन गिरा नहीं।
तमाम लोग इसे देख हैरान हो गये। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि भला कौवे के बैठने से पहाड़ कैसे हिल गया और हिलने के बावजूद चट्टाने नीचे क्यों नहीं गिरी, वैज्ञानिक तरीके से इस तस्वीर की जांच हुई, लेकिन कोई ठोस सबूत इसे लेकर मिला नहीं। उसी वक्त ब्रिटिश इंजनीयर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने इस पहाड़ी का नाम कौवाडोल रख दिया और आज भी इस पहाड़ी को कौवा डोल पहाड़ी नाम से ही जानते हैं।
इतिहास के पन्नों में कौवाडोल पहाड़
वीकिपीडिया से लेकर इतिहास के पन्नों में इस कौवा डोल पहाड़ी का जिक्र है। पत्थरों पर देवी-देवताओं की आकृति जो जुड़ी है, उसे पाल वंश से जोड़ा गया है और ऐसा होता आया है।







