आज शाम 7 बजे जब टॉस होगा और मैदान पर खिलाड़ी उतरेंगे, तो दुनिया की नजरें केवल स्कोरबोर्ड पर होंगी, लेकिन भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों का दिल अलीगढ़ के उस 28 वर्षीय युवा रिंकू सिंह के लिए धड़क रहा होगा। पिता खानचंद सिंह जी के निधन के कुछ ही घंटों बाद, अंतिम संस्कार (Last Rites) की रस्में पूरी कर यह खिलाड़ी अपनी टीम (Squad) से जुड़ चुका है और आज मैदान पर उतरने के लिए तैयार है।
महानता का वही रास्ता, जिस पर कभी सचिन चले थे
इतिहास गवाह है कि महान खिलाड़ी (Great Players) केवल अपने हुनर से नहीं, बल्कि अपने चरित्र से बनते हैं। आज का यह दृश्य हमें 1999 के विश्व कप की याद दिलाता है। तब सचिन तेंदुलकर के पिता का निधन हुआ था; सचिन भारत आए, पिता को अंतिम विदाई दी और तुरंत वापस इंग्लैंड जाकर केन्या के खिलाफ नाबाद 140 रन बनाए थे।
आज अलीगढ़ का यह ‘महाबली’ उसी विरासत को दोहराने जा रहा है। आँखों में आँसू हैं, दिल में पिता को खोने का गम है, लेकिन कंधों पर देश की जिम्मेदारी और पिता के उस सपने का बोझ है जिसे उन्होंने गैस सिलेंडर ढोते हुए देखा था।
महान ऐसे ही बना जाता है (This is how you become Great)
महानता रातों-रात या किस्मत से नहीं मिलती। महान बनने के लिए खुद को आग में झोंकना पड़ता है:
भावनाओं से ऊपर कर्तव्य: जब पिता की चिता की अग्नि अभी ठंडी भी न हुई हो और आप बल्ला थामकर देश के लिए खेलने निकल पड़ें, तो समझ लीजिए कि आप ‘महानता’ की श्रेणी में आ चुके हैं।
पिता को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि: खानचंद सिंह जी ने अपनी पूरी जिंदगी संघर्ष किया ताकि उनका बेटा रिंकू सिंह अलीगढ़ का नाम रोशन करे। आज शाम 7 बजे जब वह मैदान पर कदम रखेगा, तो वह अपने पिता के हर संघर्ष को एक सलाम देगा।
अजेय मानसिकता (Unbeatable Mindset): विपरीत परिस्थितियों में खुद को संभालना और टीम के लिए उपलब्ध होना ही एक असली चैंपियन की पहचान है।
अलीगढ़ से आसमान तक का सफर
खानचंद सिंह जी जो कल तक अलीगढ़ की गलियों में गैस सिलेंडर पहुँचाते थे, आज उनके बेटे रिंकू सिंह ने साबित कर दिया है कि संस्कार और कर्तव्य क्या होते हैं। शाम 7 बजे जब खेल शुरू होगा, तो पूरा देश इस खिलाड़ी के लिए प्रार्थना करेगा।
यह कहानी केवल एक मैच की नहीं है, यह उस जिगर की है जो टूटने के बाद भी देश के लिए धड़कता है।
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