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“राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ा महिलाओं के हक में एक ऐतिहासिक सुधार की कोशिश” 

Bihar: भारत जैसे प्राचीन लोकतांत्रिक परंपराओं वाले देश के सामने जब भी सामाजिक न्याय और समानता को मजबूत करने का अवसर आता है, तब यह केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का समय होता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक अवसर था। एक ऐसा प्रयास, जिसका उद्देश्य देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं को नीति-निर्धारण की मुख्यधारा में सशक्त भागीदारी देना था। यह सिर्फ एक बिल नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को और अधिक समावेशी बनाने की एक दूरदर्शी और सकारात्मक पहल थी। सरकार ने इस अधिनियम को एक ‘महायज्ञ’ बता रही थी जिसमें देश की हर महिला की आकांक्षाएं, सम्मान और अधिकार जुड़े हुए थे। मकसद था महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उनका उचित प्रतिनिधित्व दिलाना, ताकि वे केवल मतदाता ही नहीं, बल्कि नीति-निर्माता भी बन सकें।  लेकिन, यह ऐतिहासिक सुधार विपक्ष के राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ गया जो न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आधी आबादी की नजरों में अक्षम्य भी।

सरकार ने इस बिल को लाते समय स्पष्ट किया था कि यह किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश का मुद्दा है। यहां तक कि पीएम मोदी ने संसद में विपक्ष से यह भी कहा कि वे चाहें तो इसका पूरा क्रेटिड ले सकते हैं क्योंकि उद्देश्य महिलाओं का सशक्तिकरण था।  लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक नजरिये से देखा, महिला सशक्तिकरण की आड़ में परिसीमन को सरकार की बड़ी साजिश बताया और बिल को पास नहीं होने दिया। देश में पिछले एक दशक में महिलाओं के जीवन स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने कई ठोस कदम उठाए हैं। चाहे वह स्वच्छता अभियान को, गैस कनेक्शन हो, बैंकिंग सुविधाएं हो या आवास की बात हो। सरकारी की कई और पहल ने महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का काम किया है। और नारी शक्ति वंदन अधिनियम उसी यात्रा का स्वाभाविक और आवश्यक अगला कदम था, जो महिलाओं को निर्णय लेने के सर्वोच्च मंच तक पहुंचाने का मार्ग खोलता।

दुर्भाग्य से, जब देश को एकजुट होकर इस ऐतिहासिक कदम का समर्थन करना चाहिए था, तब विपक्ष ने एक बार फिर राजनीतिक स्वार्थ को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखा।  विपक्ष का रवैया हमेशा से दोहरा दिखाई देता रहा है। वे सार्वजनिक रूप से इस बिल के समर्थन की बात करते हैं, लेकिन हर बार एक “लेकिन” जोड़ देते हैं। इस बार भी उन्होंने तकनीकी और क्षेत्रीय मुद्दों का सहारा लेकर असली मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश की। इतिहास इस बात का गवाह है कि विपक्ष ने बार-बार महिला आरक्षण के प्रयासों को विफल किया है। 1996 में पहली बार पेश किया गया बिल अधूरा रह गया वहीं 1998 से 2003 के बीच भी कई प्रयास हुए, लेकिन हंगामे और विरोध के कारण हर बार असफल रहे। यहां तक की संसद में बिल की कॉपी फाड़ने जैसी घटनाएं भी हुईं जो लोकतंत्र के लिए शर्मनाक हैं।

2010 में राज्यसभा से बिल पास होने के बावजूद, इसे लोकसभा में पेश ही नहीं किया गया। चार वर्षों तक इसे जानबूझकर लटकाए रखना विपक्ष की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह केवल एक विधेयक का मुद्दा नहीं है, यह उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जाती। विपक्ष ने पंचायत स्तर पर आरक्षण का समर्थन इसलिए किया क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक स्थिति पर कोई खतरा नहीं था, लेकिन जैसे ही बात संसद और विधानसभाओं की आई, उनका असली चेहरा सामने आ गया। यह रवैया न केवल महिलाओं के प्रति उपेक्षा दर्शाता है, बल्कि उनके राजनीतिक सशक्तिकरण के खिलाफ एक सुनियोजित बाधा दिखाई देता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का गिर जाना केवल एक बिल का रुकना नहीं है, बल्कि देश की महिलाओं की आकांक्षाओं पर एक बड़ा झटका है। यह उन करोड़ों महिलाओं के सपनों को ठेस पहुंचाता है, जो वर्षों से समान अवसर और प्रतिनिधित्व की उम्मीद कर रही थीं। यह सवाल भी उठता है कि क्या राजनीतिक लाभ के लिए इतने महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार को रोका जाना उचित है? लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन जब वह प्रगति में बाधा बन जाए, तो वह अक्षम्य हो जाती है।

सरकार की यह पहल स्पष्ट रूप से सकारात्मक, प्रगतिशील और राष्ट्रहित में थी। यह एक ऐसा कदम था, जो भारत को वैश्विक स्तर पर महिला सशक्तिकरण के मामले में और मजबूत बना सकता था। दूसरी ओर, विपक्ष का रवैया न केवल निराशाजनक रहा, बल्कि यह दर्शाता है कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण वे देशहित और महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी नजरअंदाज करने से नहीं हिचकते। फिर भी, यह मानना होगा कि यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। देश की महिलाएं जागरूक हैं, और वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना जानती हैं। नारी शक्ति का यह आंदोलन आगे भी जारी रहेगा, और अंततः वह दिन जरूर आएगा जब महिलाओं को उनका पूरा अधिकार और सम्मान मिलेगा, चाहे कितनी भी बाधाएं क्यों न आएं।

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