Ranchi News: पिछले महीने सरकार ने पेसा अधिनियम लागू किया, लेकिन वे उसकी नियमावली को छुपाते रहे. कल जब नियमावली सामने आई, तब पता चला कि सरकार इसे छिपा क्यों रही थी. हाई कोर्ट द्वारा कई बार दबाव डालने एवं विपक्ष के आंदोलन के बाद भी सरकार जो नियमावली लेकर आई है, वह पूरी तरह से आदिवासी विरोधी है. इस सरकार ने पेसा नियमावली के नाम पर आदिवासी समाज को धोखा दिया है. अगर आप पिछली नियमावली से तुलना करें तो इस सरकार ने इसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया है.
सबसे बड़ा बदलाव तो यह है कि इस के गठन से रूढ़िजन्य विधि एवं धार्मिक प्रथा जैसे शब्द गायब हैं. जब भारतीय संविधान की धारा 13 (3) (क) भी रूढ़िजन्य प्रथाओं को स्पष्ट तौर पर पहचान दी गई है, तो उसे हटा कर यह सरकार किस को फायदा पहुंचाना चाहती है? अगर आप ग्राम सभा के गठन में रूढ़िजन्य व्यवस्था को दरकिनार कर देंगे तो फिर वैसे पेसा का क्या मतलब है? यह पेसा की मूल भावना का खुला उल्लंघन है.
Ranchi News: ये है पेसा कानून का मुख्य मकसद
पेसा कानून का मुख्य मकसद ही आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य विधियों, सामाजिक, धार्मिक प्रथाओं एवं परम्पराओं को संरक्षण देना है. सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों ने अपने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्ट किया है कि पेसा कानून आदिवासी स्वशासन, सांस्कृतिक संरक्षण और परम्परागत प्रबंधन का संवैधानिक विस्तार है. लेकिन झारखंड सरकार इसके ठीक उलट, उन लोगों को इसके तहत अधिकार देना चाह रही है, जिन्होंने हमारे धर्म, परम्परा एवं जीवनशैली को बहुत पहले छोड़ दिया है. जिनके पास अपना धर्म कोड है, जो पहले से ही अल्पसंख्यक होने के सारे लाभ लेते हैं, वो अब इस नियमावली से आदिवासियों के हक भी छीनेंगे.
साल 2013 में ओडिशा के नियमगिरि पर्वत मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने आदिवासी समाज के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों को मान्यता दी और वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को रद्द कर दिया. वहां पहले कोर्ट ने कहा था कि जब वहां कोई नहीं रहता तो खनन किया जा सकता है, उसके बदले दूसरी जगह जंगल लगाये जा सकते हैं, लेकिन आदिवासियों ने कहा, ‘वहां हमारे भगवान रहते हैं.’ उसके बाद कोर्ट ने भी हमारे धार्मिक मान्यताओं को मान कर खनन रोक दिया. जब कोर्ट भी हमारे धार्मिक मान्यताओं को मानती है तो इस राज्य सरकार को क्या दिक्कत है? ऐसे पेसा का क्या मतलब है?
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Ranchi News: नई नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकार सीमित
इस नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं. शुरुआत अगर ‘सामुदायिक संसाधन’ की परिभाषा से करें, तो पुरानी नियमावली में अधिसूचित पारंपरिक क्षेत्र में अवस्थित जल, जंगल, जमीन, लघु खनिज समेत सभी प्राकृतिक संसाधनों का अधिकार ग्राम सभा को दिया जाना था, जिसे घटा कर सिर्फ सरना, मसना, जाहेरथान और सांस्कृतिक भवनों तक सीमित कर दिया गया है. शेड्यूल एरिया में जल, जंगल एवं जमीन के अधिकार से आप आदिवासियों को कैसे दूर रख सकते हैं?
Ranchi News: पेसा कानून से ग्राम सभा को मिलता है ये फायदा
पेसा के तहत ग्राम सभा को संसाधनों का प्रबंधन करने की छूट होती है, लेकिन यहां उनके अधिकार सीमित कर दिए गए हैं. पहले ग्राम सभा राज्य की योजनाओं एवं DMFT समेत अन्य कार्यक्रमों को अनुमोदित कर सकती थी, लेकिन अब सिर्फ उनकी सहमति ली जायेगी. अगर 30 दिन में सहमति नहीं दी गई तो उसे स्वीकृत मान लिया जाएगा. इस पेसा में गठन से लेकर विवाद तक, हर अधिकार उपायुक्त को दिए गए हैं, फिर ग्राम सभा का क्या रोल होगा, यह समझा जा सकता है?
Ranchi News: पहले ग्राम सभाओं के पास थे ये अधिकार
पहले बालू, मिट्टी, पत्थर, मोरम जैसे लघु खनिजों के सारे अधिकार ग्राम सभाओं के पास थे, लेकिन अब उन्हें ‘सरकार के निर्देशों का पालन’ करना है. पहले ग्राम सभा ग्रामीणों के इस्तेमाल हेतु लघु खनिजों के खनन की इजाजत दे सकती थी, लेकिन अब सब कुछ सरकार के हाथ में है. पहले CNT/SPT Act के उल्लंघन के मामलों में ग्राम सभा को भूमि की वापसी का अधिकार दिया गया था, जिसे हटा दिया गया है. जिस सरकार में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग स्वयं ही इन कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं, उसमें तो यह होना ही था.
Ranchi News: नियमावली में शेड्यूल एरिया में लगने वाले उद्योगों के बारे में कोई गाइडलाइन नहीं
इस नियमावली में शेड्यूल एरिया के तहत लगने वाले उद्योगों के बारे में कोई गाइडलाइन नहीं है. हर बात उद्योग, डैम अथवा विकास के नाम पर विस्थापन की कीमत हम आदिवासी/ मूलवासी क्यों चुकाए? ऐसा कैसे चलेगा, और कब तक? यहां टाटा समूह को पानी की कमी ना हो, इसके लिए चांडिल डैम बनाया गया, उसमें 116 गांव डूब गए, लेकिन वहां के विस्थापितों को क्या मिला? पूरा जमशेदपुर शहर जिन भूमिपुत्रों की जमीन पर बसा है, वे लोग कहां हैं? उनकी क्या स्थिति है? उनमें से कितनों के जीवन में बदलाव आया? अगर कंपनियां अरबों-खरबों कमाये, और विस्थापित उजड़ते जायें, तो फिर ऐसे औद्योगीकरण का क्या मतलब है? टाटा लीज के नवीनीकरण की प्रक्रिया तुरंत रोकी जानी चाहिए.
Ranchi News: नियमावली में आदिवासियों के हितों के लिए कुछ नही
इस नियमावली को बनाते समय राज्य सरकार को शेड्यूल एरिया में शराब की दुकानें खुलवाने से लेकर शराब भट्ठियां तक सब कुछ याद रहा, लेकिन वे आदिवासियों के हितों का ध्यान रखना भूल गए. विस्थापितों के अधिकारों पर कोई बात नहीं हुई. यही इस सरकार की प्राथमिकता है. आदिवासियों के अधिकारों को छीनने की इस कोशिश का, हर स्तर पर, पुरजोर विरोध होगा.
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