घाटशिला उपचुनाव: “गठबंधन धर्म” बनाम “अपना धर्म

घाटशिला उपचुनाव में झामुमो बनाम कांग्रेस की ‘गठबंधन धर्म’ की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। बलमुचू की सक्रियता ने सियासत को दिलचस्प बना दिया।


घाटशिला उपचुनाव घाटशिला: बिहार चुनाव की गहमागहमी के बीच झारखंड के घाटशिला विधानसभा सीट पर भी हलचल शुरू हो गई है। यह सीट वैसे तो पूर्व शिक्षा मंत्री और झामुमो नेता रामदास सोरेन के निधन से खाली हुई है, लेकिन अब यह सीट झामुमो-कांग्रेस गठबंधन की “सीटिंग अरेंजमेंट” वाली कुर्सी से ज्यादा “म्यूजिकल चेयर” जैसी लगने लगी है।

कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी ने तो साफ-साफ कह दिया – “गठबंधन धर्म निभाइए और झामुमो उम्मीदवार को समर्थन दीजिए”। लेकिन कांग्रेस नेता प्रदीप कुमार बलमुचू भी चुप बैठने वालों में से नहीं हैं। तीन बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके बलमुचू जी कह रहे हैं – “हम भी चुनाव लड़ेंगे, और आलाकमान को जमीनी हकीकत बताएंगे।”


Key Highlights

  • पूर्व मंत्री रामदास सोरेन के निधन से घाटशिला सीट खाली हुई।

  • झामुमो को स्वाभाविक दावा, लेकिन कांग्रेस में अंदरखाने हलचल।

  • प्रदीप बलमुचू ने जताई उपचुनाव लड़ने की इच्छा।

  • कांग्रेस प्रभारी ने झामुमो उम्मीदवार को समर्थन देने का निर्देश दिया।

  • गठबंधन धर्म की दुहाई देकर बलमुचू ने आलाकमान को मनाने की तैयारी की।


घाटशिला उपचुनाव:

अब सवाल यह है कि यह “जमीनी हकीकत” आखिर है क्या? शायद यह कि कार्यकर्ता चाहते हैं, नेता चाहते हैं, पर गठबंधन नहीं चाहता। यानी बात वही हो गई – “घर का मालिक डाइट पर है, लेकिन घरवाले हर दिन मटन-पुलाव मांग रहे हैं।”

बलमुचू का तर्क भी बड़ा दिलचस्प है। वे याद दिला रहे हैं कि कांग्रेस ने पिछली बार राज्यसभा की सीट झामुमो को छोड़ दी थी। तो अब बारी झामुमो की है कि वह घाटशिला सीट कांग्रेस को छोड़ दे। राजनीति में इस तर्क को कहते हैं – “Give and Take Policy”, लेकिन यहां “Give वाला कोई और है, Take वाले हमेशा हम हैं” वाली स्थिति बन गई है।

घाटशिला उपचुनाव:

झामुमो की स्थिति भी समझिए। पिछले दो चुनावों से रामदास सोरेन यहां से जीत रहे थे। ऐसे में झामुमो के लिए यह सीट छोड़ना ऐसा होगा, जैसे क्रिकेट टीम कैप्टन को कह दिया जाए कि “टॉस जीत गए हो, पर बैटिंग किसी और को करनी है।”

अब देखना यह है कि कांग्रेस आलाकमान बलमुचू की “ग्राउंड रिपोर्ट” सुनकर गठबंधन धर्म को आगे रखता है या बलमुचू धर्म को। जो भी हो, घाटशिला की यह सियासत चुनाव से पहले ही एक मजेदार धारावाहिक की स्क्रिप्ट जैसी लगने लगी है।

Saffrn

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