महाराष्ट्र निकाय चुनाव: ‘महा-युति’ की बढ़त, विपक्ष की बहानों की राजनीति फिर बेनकाब
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में इस बार जो तस्वीर उभरती दिख रही है, वह एक वाक्य में समेटी जा सकती है—मतदाता ने सत्ता का मूड बता दिया, विपक्ष ने फिर बहाना खोज लिया।
प्रारंभिक रुझानों/नतीजों में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) की गठबंधन राजनीति कई प्रमुख शहरी निकायों में आगे निकलती दिखी है। मुंबई की बीएमसी जैसे प्रतिष्ठा-युद्ध में भी संकेत साफ हैं कि केसरिया खेमा निर्णायक बढ़त की ओर बढ़ रहा है।
शहरी महाराष्ट्र का संदेश: “काम–मैनेजमेंट” बनाम “गठबंधन–गणित”
नगर निकाय चुनावों में अक्सर स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं—पानी, कचरा, सड़क, स्वास्थ्य सेवाएँ, भ्रष्टाचार, ठेकेदारी और वार्ड स्तर का नेटवर्क। मगर इस बार चुनाव केवल ‘स्थानीय’ नहीं रहा।
रुझानों में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की बढ़त का मतलब यह भी है कि शहरी वोटर ने राजनीतिक स्थिरता और संगठनात्मक पकड़ को प्राथमिकता दी, जबकि विपक्ष गठबंधन-प्रयोगों और नेतृत्व-संकट में उलझा रहा।
बीएमसी: जिस किले पर सालों से ‘ठाकरे ब्रांड’ की तालेबंदी थी, वहाँ सेंध क्यों लगी?
मुंबई बीएमसी को लेकर नतीजों की चर्चा इसलिए ज्यादा है क्योंकि यह सिर्फ नगर निगम नहीं—राजनीतिक शक्ति का एटीएम भी माना जाता रहा है। शुरुआती रुझानों में भाजपा–शिवसेना गठबंधन का 100 के पार निकलना और कांग्रेस का सीमित प्रदर्शन, विपक्ष के लिए सीधा झटका है।
यहाँ सवाल विपक्ष से बनता है:
अगर शहर में आपका “भावनात्मक ब्रांड” इतना मजबूत था, तो वार्ड लेवल मशीनरी क्यों ढह गई?
और अगर जनता नाराज़ थी, तो नाराज़गी का लाभ विपक्ष को क्यों नहीं मिला?
पुणे–पिंपरी चिंचवड़: ‘पवार प्रभाव’ वाले इलाके में भी भाजपा की पकड़
पुणे और पिंपरी चिंचवड़ जैसे शहरी क्षेत्रों में शुरुआती रुझान भाजपा के पक्ष में दिखे। रिपोर्ट्स के मुताबिक पुणे में भाजपा कई सीटों पर आगे रही और विपक्षी समीकरणों का असर सीमित दिखा।
यह संकेत है कि शहरी मध्यमवर्गीय वोटर “कौन किसके साथ है” से ज्यादा “कौन मैनेज कर सकता है” पर वोट करता है।
विपक्ष की पराजय का कारण: संगठन की कमजोरी या बहाने की आदत?
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प (और विपक्ष के लिए सबसे असहज) पहलू यह है कि नतीजों के समानांतर पराजय की स्क्रिप्ट भी चालू हो गई—
कभी “वोट चोरी”, कभी “चुनाव आयोग”, कभी “स्याही/इंक” विवाद।
राहुल गांधी ने मतदान के निशान (इंडेलिबल इंक) को लेकर सवाल उठाते हुए “वोट चोरी” जैसे आरोपों की भाषा अपनाई, जिस पर राज्य निर्वाचन तंत्र की तरफ से जांच की बात सामने आई।
लेकिन दिक्कत यह है कि विपक्ष के पास अब हार का विश्लेषण कम और हार का बहाना ज्यादा है।
चुनाव दर चुनाव वही रटा-रटाया आरोप—और फिर अगली बार वही कमजोर तैयारी।
‘अगर आयोग गलत है’ तो जीत कब सही होती है?
यह सवाल विपक्ष से पूछा जाना चाहिए कि—
जब कहीं जीत मिलती है तो वह जनता का फैसला, और जब हार मिलती है तो चुनाव आयोग की साजिश?
इस तरह की राजनीति न सिर्फ चुनावी सुधार के नाम पर नैराश्य बेचती है, बल्कि धीरे-धीरे अपने ही वोटर को यह संदेश भी देती है कि “हम जीतने के लिए नहीं, सफाई देने के लिए तैयार रहते हैं।”
कांग्रेस की हालत: मैदान में उम्मीदवार हैं, लेकिन नैरेटिव गायब है
कांग्रेस का संकट यह नहीं कि वह हर जगह शून्य हो गई—बल्कि यह है कि वह राजनीतिक दिशा खो चुकी है।
कुछ जगहों पर प्रदर्शन/उपस्थिति जरूर दिखती है, लेकिन बड़े शहरी केंद्रों में कांग्रेस ना तो पहली पसंद बन रही है और ना ही निर्णायक विकल्प।
कांग्रेस की समस्या का सार यह है:
संगठन कमजोर
स्थानीय नेतृत्व बिखरा
मुद्दे सामान्य
और हार का जवाब—पुराना
विपक्ष अगर मानता है कि शहरी निकायों में सत्ता-विरोधी माहौल था, तो फिर सवाल यह है कि उस माहौल का राजनीतिक लाभ किसने उठाया—भाजपा-शिवसेना ने या विपक्ष ने?
रुझान बताते हैं: लाभ विपक्ष नहीं उठा सका।
महा-युति की जीत का अर्थ: “मैदान में मौजूदगी ही आधी जीत है”
भाजपा–शिवसेना गठबंधन को इस चुनाव में बढ़त इसलिए भी मिलती दिख रही है क्योंकि उसने:
वार्ड-स्तर पर उम्मीदवार और कैडर सक्रिय रखा
स्थानीय मुद्दों पर पकड़ बनाई
और सबसे महत्वपूर्ण—विपक्ष की बिखरी राजनीति का फायदा उठाया
यह चुनाव एक संदेश दे रहा है कि शहरी निकायों में जनता “आदर्श भाषणों” से ज्यादा काम की क्षमता और प्रशासनिक पकड़ देखती है।
निष्कर्ष: हार की समीक्षा नहीं करेंगे तो हार की आदत बन जाएगी
महाराष्ट्र निकाय चुनावों में महा-युति की बढ़त सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं—यह विपक्ष के लिए चेतावनी भी है।
क्योंकि राजनीति में जनता मौके देती है, लेकिन हर बार बहाना सुनने नहीं आती।
और अगर विपक्ष हर हार के बाद लोकतंत्र पर सवाल उठाएगा, तो अंत में सवाल विपक्ष पर ही आएगा—
आप चुनाव लड़ने आए थे या हार का प्रेस नोट तैयार करने?
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