यूजीसी नियमों के समर्थन में दलित-ओबीसी समाज ने निकाली रैली

Bokaro: यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जारी राजनीतिक घमासान के बीच बोकारो में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। मंगलवार को बोकारो के नया मोड़ स्थित बिरसा चौक पर एससी, एसटी और ओबीसी समाज के लोगों ने यूजीसी के समर्थन में रैली निकाली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त किया।

यूजीसी के समर्थन में जुटी बड़ी भीड़

बिरसा चौक पर जुटे लोगों ने कहा कि यूजीसी द्वारा लाए गए नए प्रावधान उच्च शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय को मजबूती देंगे। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह कदम वर्षों से चले आ रहे भेदभावपूर्ण ढांचे को तोड़ने वाला है और वंचित समाज के छात्रों को आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर प्रदान करेगा।

‘भेदभाव पर करारा प्रहार है नया नियम’

प्रदर्शन में शामिल वक्ताओं ने कहा कि यूजीसी के नए नियम दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए शिक्षा के दरवाजे और चौड़े करेंगे। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला बताया।

सामंती सोच पर साधा निशाना

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने समाज के कुछ वर्गों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “कुछ सामंती सोच वाले लोग नहीं चाहते कि दलित, आदिवासी और ओबीसी समाज शिक्षा के क्षेत्र में बराबरी हासिल करे। इसी कारण वे आज यूजीसी के नए नियमों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना कर रहे हैं।” वक्ताओं ने यह भी कहा कि यही लोग कभी प्रधानमंत्री मोदी को “महापुरुष” बताने से नहीं चूकते थे, लेकिन अब समानता की नीति से घबराकर विरोध कर रहे हैं।

पीएम मोदी को बताया ‘समानता का प्रहरी’

प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “समानता का प्रहरी” बताते हुए कहा कि उनकी सरकार में ही वंचित समाज को शिक्षा, सम्मान और अवसर मिला है। यूजीसी के नए नियम उसी सोच का परिणाम हैं।

‘यह लड़ाई सम्मान और बराबरी की है’

दलित-ओबीसी समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ हो रही राजनीति को वे स्वीकार नहीं करेंगे। यह संघर्ष केवल एक नियम का नहीं, बल्कि शिक्षा में सम्मान, अवसर और बराबरी की लड़ाई है।गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र के पूर्व प्रत्याशी, ज्ञानेश्वर प्रसाद यूजीसी के नए नियम सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम हैं। इससे वंचित समाज को शिक्षा में वास्तविक भागीदारी मिलेगी। वहीं सहदेव साव ने कहा कि जो लोग समानता से डरते हैं, वही इसका विरोध कर रहे हैं। दलित-ओबीसी समाज अब पीछे हटने वाला नहीं है।

 

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