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Women’s Day: Bihar के पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, गांवों में बदलाव की नई कहानी

Patna: Biharमें जब आधी आबादी को नेतृत्व का बराबर मौका मिला, तो विकास की रफ्तार तेज हो गई। महिलाओं का उभरता नेतृत्व पंचायतों को मजबूती देने के साथ समाज को सशक्त बना रहा है। राज्य में कभी महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित माना जाता था। आज इनका ग्रामीण शासन नेतृत्व की मिसाल पेश कर रहा है। राज्य सरकार की दूरदर्शी नीति के तहत 2006 में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया। ऐसा करने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना। इसके बाद 2007 में नगर निकायों में भी यही क्रांतिकारी कदम उठाया गया। इस नीति का असर 2021 के पंचायत चुनावों में साफ दिखा, जहां महिलाओं ने विभिन्न पदों पर मजबूत उपस्थिति दर्ज की।

2021 के पंचायत चुनाव में महिला मुखियाओं और सरपंचों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक रही। जिला परिषद अध्यक्ष के 38 पदों में से 29 (यानी 76 प्रतिशत से अधिक) महिलाओं ने जीते। पंचायत समिति प्रमुख पदों पर भी महिलाओं का दबदबा रहा, जहां 66 प्रतिशत से ज्यादा सीटें उन्होंने हासिल कीं। वार्ड सदस्य, समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य और पंच स्तर पर भी महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत के आसपास या उससे ऊपर रही। कुल मिलाकर, राज्य भर में विभिन्न पंचायती पदों पर 1 लाख से अधिक महिलाएं निर्वाचित हुईं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। बल्कि, महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और समाज में उनके सम्मान की कहानियां बनीं।

महिला पंचायत प्रतिनिधियों की कोशिश से बदलाव की धारा

Bihar  पंचायती राज विभाग विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर महिला पंचायत प्रतिनिधियों को नियमित प्रशिक्षण, मेंटरशिप और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों से मजबूत कर रहा है। इन प्रयासों का नतीजा है कि ग्रामीण इलाकों में महिला मुखियाएं अब विकास की नई दिशा तय कर रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जल संरक्षण, लड़कियों की सुरक्षा, मासिक धर्म स्वास्थ्य जागरूकता और बाल विवाह रोकथाम जैसे मुद्दों पर उनकी प्राथमिकता ने गांवों का परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है। कई पंचायतों में महिला मुखियाओं ने सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें लगवाईं, स्कूल ड्रॉपआउट दर घटी और घरेलू हिंसा के मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप किया।

सुरक्षा के लिए रोशनी की व्यवस्था

शेखपुरा जिले के अरियारी प्रखंड की कसार पंचायत की मुखिया सुजाता कुमारी ने महिला एवं बालिका अनुकूल पंचायत का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने पंचायत में असुरक्षित और अंधेरे स्थानों की पहचान की। ग्राम पंचायत फंड से ट्यूबलाइट लगवाईं, पुलिस और सखी केंद्र के कर्मचारियों से चर्चा की और पंचायत भवन सहित प्रमुख जगहों पर महिला हेल्पलाइन नंबर लिखवाए। इससे महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार आया है, और समुदाय में भय का माहौल कम हुआ है।

लड़कियों के लिए पुस्तकालय और सशक्तिकरण

शेखपुरा के ही गागड़ी पंचायत की मुखिया ललिता देवी ने संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के महिला एवं बालिका हितैषी पंचायत प्रशिक्षण के बाद संकल्प लिया कि उनकी पंचायत में लड़कियां सशक्त बनेंगी। महिला सभा में लड़कियों की मांग पर 15वें वित्त आयोग के फंड से पुस्तकालय बनवाया गया। अब यहां बच्चियां नियमित पढ़ाई करती हैं। ललिता देवी का अगला लक्ष्य डिजिटल साक्षरता केंद्र स्थापित करना है, जो लड़कियों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ेगा।

गांव में बेटियां ला रहीं स्वास्थ्य क्रांति

लखीसराय जिले के नोनगढ़ पंचायत में मुखिया जुली देवी की पहल पर युवा लड़कियां स्वास्थ्य क्रांति ला रही हैं। महज 17-18 साल की उम्र की छात्राएं रोजाना सुबह 5 से 7 बजे नि:शुल्क एडवांस योगा ट्रेनिंग देती हैं। इन सत्रों में रोजाना करीब 100 लोग शामिल होते हैं, जिनमें महिलाओं और बच्चों की भागीदारी सबसे अधिक है।

महिला नेतृत्व वाला आदर्श मॉडल पंचायत

Bihar के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड की मोतीपुर ग्राम पंचायत बिहार के आदर्श मॉडल पंचायतों में शुमार है। 2016 में मुखिया बनने के बाद प्रेमा देवी ने पंचायत की मूलभूत समस्याओं पर काम शुरू किया। जलवायु परिवर्तन के दौर में जल संचयन पर फोकस करते हुए अमृत सरोवर, सार्वजनिक और निजी तालाबों का निर्माण व नवीनीकरण किया। दो दर्जन से ज्यादा निजी तालाब, सोख्ते और सरकारी भवनों में वर्षा जल संचयन संरचनाएं भी बनीं। इसके अलावा गोबर गैस प्लांट और पोषण वाटिका जैसे प्रयासों ने ग्रामीण जीवन को स्वस्थ और आत्मनिर्भर बनाया है।

भोजपुर की ‘पैड वाली मुखिया’

कोरोना काल में भोजपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड अंतर्गत दांवा पंचायत की मुखिया सुशुमलता कुशवाहा ने महिलाओं के लिए अनूठी पहल की। उन्होंने पंचायत स्तर पर सेनेटरी पैड बनाने की सेमी-ऑटोमेटिक मशीन लगवाई और ‘संगिनी’ ब्रांड के नाम से सस्ते व गुणवत्तापूर्ण पैड का उत्पादन शुरू किया। इस पहल से पंचायत की महिलाओं को घर के पास ही रोजगार मिल गया। जीविका दीदियां इन्हें आसपास के गांवों और पंचायतों में बेच रही हैं, जिससे मासिक धर्म स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण दोनों को बढ़ावा मिला है।

बिहार में महिला विकास मॉडल

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के माध्यम से बिहार के विकास मॉडल को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बहुआयामी प्रयास किए-

पुलिस बल में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण (2013 से) लागू होने के बाद महिला पुलिसकर्मियों की संख्या में बिहार देश में नंबर-1 पर है। वर्तमान में 30 हजार से अधिक महिला पुलिसकर्मी कार्यरत हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग और खेल यूनिवर्सिटी में नामांकन के लिए लड़कियों को 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना। इसी तरह महिला साक्षरता दर 2001 के 33.57 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 73.91 प्रतिशत के आसपास पहुंची है। कक्षा 10वीं में बालिकाओं का नामांकन 2005 के 1.87 लाख से बढ़कर हाल में 8 लाख से अधिक हो गया है।

गांव से शहरों तक महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता

जीविका जैसी स्वयं सहायता समूह योजना के जरिए राज्यभर में 1 करोड़ 40 लाख से अधिक महिलाएं जीविका से जुड़कर आत्मनिर्भर बनीं। ग्रामीण क्षेत्रों में 11 लाख और शहरी क्षेत्रों में 77,332 स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनके माध्यम से 10 लाख 40 हजार से अधिक बैंक खाते खोले गए। रोजगार सृजन के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 1.81 करोड़ महिलाओं को 10 हजार रुपए की प्रारंभिक सहायता दी गई। ये सभी प्रयास मिलकर Bihar को महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का मॉडल बना रहे हैं, जहां आधी आबादी की भागीदारी से पूरे समाज का उत्थान हो रहा है।

 

 

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