Bihar Education PTM, पटना: बिहार में स्कूली शिक्षा को लेकर 26 सितंबर 2026 का दिन एक अलग संदेश लेकर आया। पटना के दानापुर स्थित रामजीचक राजकीय मध्य विद्यालय में आयोजित पेरेंट-टीचर मीटिंग (PTM) में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की भागीदारी ने स्कूल, शिक्षक और अभिभावक के बीच संवाद की भूमिका को नए नजरिए से देखने का अवसर दिया। आमतौर पर PTM को बच्चों की पढ़ाई और उनकी प्रगति पर चर्चा के लिए स्कूल और अभिभावकों के बीच संवाद का माध्यम माना जाता है। लेकिन जब मुख्यमंत्री स्वयं सरकारी स्कूल पहुंचकर अभिभावकों और शिक्षकों के बीच बैठते हैं, तो इसका संदेश स्कूल की चारदीवारी से आगे तक जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि बच्चों की शिक्षा, उनकी उपस्थिति, सीखने की क्षमता, अनुशासन और समग्र विकास सरकार की प्राथमिकताओं से सीधे जुड़े विषय हैं।
मुख्यमंत्री की मौजूदगी से बढ़ सकता है अभिभावकों का भरोसा
बच्चों की शिक्षा में अभिभावक और शिक्षक दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार अभिभावक अपने बच्चे की पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं को स्कूल तक पूरी तरह नहीं पहुंचा पाते। दूसरी ओर, शिक्षक भी बच्चे के घर-परिवार और उसकी सामाजिक परिस्थितियों को हमेशा पूरी तरह नहीं जान पाते। PTM इस दूरी को कम करने का एक प्रभावी माध्यम हो सकता है। ऐसे में मुख्यमंत्री की भागीदारी अभिभावकों को इस प्रक्रिया से अधिक सक्रिय रूप से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे PTM केवल औपचारिक बैठक न रहकर बच्चों की वास्तविक जरूरतों और उनकी प्रगति पर चर्चा का मंच बन सकती है।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए भी संदेश
मुख्यमंत्री का सरकारी विद्यालय में पहुंचकर शिक्षकों से सीधे संवाद करना शिक्षकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। इससे यह संकेत जाता है कि सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षक और उनके सामने आने वाली चुनौतियां शासन की प्राथमिकताओं का हिस्सा हैं। शिक्षकों का मनोबल किसी भी शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष है। यदि PTM जैसी गतिविधियों के माध्यम से शिक्षक, अभिभावक और स्कूल प्रबंधन लगातार संवाद में रहें, तो बच्चों की उपस्थिति, पढ़ाई और सीखने के परिणामों पर अधिक व्यवस्थित तरीके से काम किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी पहल का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है जब वह एक दिन के आयोजन तक सीमित न रहकर नियमित व्यवस्था का हिस्सा बने।

बच्चों के लिए भी बड़ा संदेश
इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र आखिरकार बच्चे ही हैं। जब बच्चों को यह महसूस होता है कि उनके स्कूल और उनकी पढ़ाई को शासन के शीर्ष स्तर तक महत्व दिया जा रहा है, तो उनके भीतर विद्यालय के प्रति जुड़ाव और आत्मविश्वास बढ़ सकता है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह संदेश खास मायने रखता है कि उनकी शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। स्कूल केवल पढ़ाई कराने की जगह नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व, अनुशासन, रुचि और प्रतिभा को विकसित करने का स्थान है। PTM में बच्चे की केवल परीक्षा या रिपोर्ट कार्ड पर चर्चा पर्याप्त नहीं है। उसकी रुचि, व्यवहार, सीखने की गति, प्रतिभा और भविष्य की संभावनाओं को भी समझना जरूरी है। इस दृष्टि से PTM को एक व्यापक संवाद मंच के रूप में देखा जाना चाहिए।
PTM को नियमित और परिणामोन्मुख बनाने की जरूरत
मुख्यमंत्री की रामजीचक राजकीय मध्य विद्यालय में भागीदारी से PTM को लेकर एक व्यापक चर्चा जरूर शुरू हो सकती है। लेकिन इस पहल की सार्थकता इस बात से तय होगी कि इससे राज्य के दूसरे विद्यालयों में अभिभावक-शिक्षक संवाद कितना मजबूत होता है। यदि PTM नियमित हो, उसमें बच्चों की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा हो और बैठक के बाद लिए गए निर्णयों की समीक्षा भी की जाए, तो इसका प्रभाव अधिक दिखाई दे सकता है। इसके लिए सरकार को दिशा देने, शिक्षकों को नेतृत्व करने और अभिभावकों को सक्रिय साझेदार की भूमिका निभाने की जरूरत होगी। आखिरकार बच्चों की शिक्षा केवल सरकार या स्कूल की जिम्मेदारी नहीं है। यह परिवार, शिक्षक, विद्यालय और समाज की साझा जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री का एक सरकारी स्कूल की PTM में बैठना इसी साझेदारी की ओर ध्यान खींचने वाली पहल के रूप में देखा जा सकता है। अब जरूरत इस संवाद को लगातार मजबूत करने की है, ताकि PTM एक औपचारिक बैठक नहीं बल्कि बच्चों के बेहतर भविष्य की साझा योजना बन सके।


















