लुप्त होती लोक कलाओं के पुनर्जीवन की पहल, गुरु-शिष्य योजना बनी सहारा

पटना : बिहार की लोक परंपराओं और दुर्लभ कलाओं को संरक्षित करने के लिए कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से मुख्यमंत्री गुरु-शिष्य परंपरा योजना संचालित की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य अनुभवी गुरुओं के मार्गदर्शन में नई पीढ़ी को पारंपरिक कला रूपों का प्रशिक्षण देकर उन्हें पुनर्जीवित करना है। इस पहल के तहत अब तक कुल 258 आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। योजना के अंतर्गत लोकनृत्य, लोकसंगीत, लोकनाट्य, शास्त्रीय संगीत और चित्रकला जैसी विविध विधाओं को शामिल किया गया है।

योजना में गौरैयाबाबा, भरथरी बाबा, सती बिहुला व हिरनी-वीरनी जैसी लोकगाथाओं के साथ बिरहा, चकुली, कीर्तनियां जैसे लोकनाट्य को बढ़ावा दिया जा रहा है

योजना में गौरैयाबाबा, भरथरी बाबा, सती बिहुला और हिरनी-वीरनी जैसी लोकगाथाओं के साथ बिरहा, चकुली, कीर्तनियां जैसे लोकनाट्य को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं पाईका, झिझिया, कठघोड़वा जैसे लोकनृत्य और चैता, सुमंगली व संस्कार गीत जैसे लोकसंगीत भी प्रशिक्षण का हिस्सा हैं। इसके अलावा सारंगी, ईसराज, नगाड़ा जैसे वाद्य यंत्रों तथा ध्रुपद, ठुमरी, दादरा, सितार और पखावज जैसी शास्त्रीय विधाओं को भी शामिल किया गया है। चित्रकला के क्षेत्र में पटना कलम, टेराकोटा और भोजपुरी छापा कला को संरक्षित करने पर विशेष जोर है।

योजना के तहत 2 वर्षों का प्रशिक्षण दिया जाता है

योजना के तहत दो वर्षों का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसके समापन पर गुरु और शिष्य की संयुक्त प्रस्तुति के साथ दीक्षांत समारोह आयोजित कर उन्हें सम्मानित किया जाता है। वित्तीय सहायता के रूप में गुरुओं को 15 हजार रुपए, संगतकारों को 7500 रुपए और शिष्यों को तीन हजार रुपए प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। शिष्यों के लिए हर महीने कम से कम 12 दिन की उपस्थिति अनिवार्य रखी गई है।

गुरुओं की आयु 50 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए व संबंधित कला में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव आवश्यक है

पात्रता के अनुसार, गुरुओं की आयु 50 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए और संबंधित कला में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव आवश्यक है। वहीं शिष्यों के लिए बिहार का निवासी होना और कला सीखने की इच्छा और योग्यता होना जरूरी है। गुरुओं का चयन विभाग की विशेषज्ञ समिति द्वारा तथा शिष्यों का चयन जिला स्तर पर किया जाता है।

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