जगन्नाथपुर मेले में परंपरागत ‘कुमनी’ की धूम: मछली पकड़ने वाले औजार की बढ़ी मांग, बारिश में होती है खूब बिक्री

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जगन्नाथपुर मेले में परंपरागत 'कुमनी' की धूम: मछली पकड़ने वाले औजार की बढ़ी मांग, बारिश में होती है खूब बिक्री
जगन्नाथपुर मेले में परंपरागत 'कुमनी' की धूम: मछली पकड़ने वाले औजार की बढ़ी मांग, बारिश में होती है खूब बिक्री
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रांची: रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर रथ मेला में इस वर्ष भी परंपरागत ग्रामीण औजारों की धूम देखी जा रही है। विशेषकर ‘कुमनी’ नामक मछली पकड़ने वाला बांस से बना उपकरण खरीदारों का आकर्षण बना हुआ है। यह उपकरण बारिश के मौसम में तालाब, खेत और नदियों में मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल होता है। मेले में 2000 से अधिक दुकानें लगी हैं, लेकिन पारंपरिक ‘कुमनी’ की दुकानें लोगों का विशेष ध्यान खींच रही हैं।

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कुमनी को पानी के बहाव में लगाया जाता है। मछलियां इसमें फंस जाती हैं और ग्रामीण समुदाय आज भी इसे एक भरोसेमंद मछली पकड़ने के औजार के रूप में इस्तेमाल करता है। यह पूरी तरह से हाथ से बांस से बनाया गया उपकरण है। इसे बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि एक कुमनी तैयार करने में उन्हें लगभग चार महीने का समय लगता है।

बिक्री के लिए कुमनी लेकर आए एक दुकानदार ने बताया, “हम लोग आंगरावारी से आए हैं और हर साल मेले में यह पारंपरिक सामान बेचते हैं। यह हमारी आजीविका से जुड़ा है। हमारे पुरखे भी यह काम करते थे और अब हम भी यह परंपरा निभा रहे हैं।”

कुमनी की कीमत ₹300 से ₹350 के बीच है और इसकी बिण्क्री केवल रथ मेला जैसे पारंपरिक आयोजनों में ही देखने को मिलती है। दुकानदार बताते हैं कि वे पूरे 9 दिनों तक दुकान नहीं लगाते, बल्कि एक-एक दिन के लिए विभिन्न स्थानों पर मेले के दौरान इसे बेचते हैं।

ग्रामीण जीवन की झलक और पारंपरिक शिल्प का अद्भुत उदाहरण ‘कुमनी’ न केवल मछली पकड़ने का औजार है, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत भी है, जिसे इस मेले के माध्यम से जीवित रखा गया है।

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