रांचीः कहा जाता है कि हौसला बुलंद हो तो बड़ी से बड़ी मुश्किल का सामना किया जा सकता है, सपने को साकार किया जा सकता है. इसे सच साबित कर दिखाया है राजधानी रांची की महिला मूर्तिकार माधवी पाल ने. पति की मौत के बाद माधवी पाल ने न सिर्फ पुरुषों के इस पेशे में अपनी पहचान बनाई, बल्कि इसे बुंलदियों तक पहुंचाया. आखिर एक मां की मूर्ति एक मां से बेहतर कौन बना सकता है? लेकिन, कोरोना की मार से माधवी आज भूखे मरने की कगार पर है.
राजधानी रांची के कोकर इलाके में रहने वाली माधवी पाल बताती है कि इनके पति मूर्तिकार थें, यही हमारी पेशा था, आजीविका का साधन था. मैं भी पति के साथ कामकाज देखा करती थी, मूर्ति निर्माण में हाथ बंटाया करती थी. लेकिन, पति की मौत के बाद सब कुछ विखरता नजर आया, हर सपना जमींदोज होता नजर आया. आखिरकार पति की राह पर चल पुरुषों के इस पेशा को अपनाया.
माधवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुरुष प्रधान पेशे में अपनी पहचान कायम बनाने की थी, माधवी ने इसे एक चैलेंज की तरह लिया और मूर्ति बनाने का काम करने लगी. एक छोटे से स्टूडियो में मूर्ति को रखना और चेहरे की हर रुप-रेखा और भाव-भंगिमा को उतारना आसान नहीं होता.
आज माधवी की ‘मूर्ति स्टूडियो’ शहर में एक पहचान बना चुकी है. लेकिन, कोरोना ने दुर्गा पूजा के रंग को फीका कर दिया, कोरोना गाइड लाइन की वजह से पिछली बार भी लाखों रुपये का नुकसान हुआ था और इस बार भी नुकसान का सामना करना पड़ा.
शहर में मूर्ति स्टूडियो की एक पहचान है
लेकिन इस बार का नुकसान सरकार द्वारा कोरोना गाइड लाइन देरी से जारी करने के कारण हुआ. जारी गाइडलाइन में मूर्ति का हाइट 5 फिट फिक्स दिया है. जब तक सरकार की गाइड लाइन आती, तब तक मूर्तियों का निर्माण हो चुका था. अब कोई भी 7 फिट की मूर्ति खरीदने को तैयार नहीं है.
हताश भाव से माधवी पाल बताती है कि मूर्तिकार पहले से ही कर्ज में डूबे हुए थें, एक उम्मीद थी कि इस बार अच्छी आमदनी होगी तो कर्ज भी चुका दिया जाएगा, लेकिन यह सपना भी टूट गया. कोलकाता के बाद सबसे ज्यादा धुमधाम से दूर्गा पुजा रांची में ही मनाया जाता है.
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