झारखंड का जालियांवाला कांड, जब आदिवासियों के लाश से भरा गया था कुंआ, 54 वर्ष बाद निकाली गई थी गोली 

Kharsanwa- मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आज खरसांवा में एक जनवरी 1948 को मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की सभा मेंं उड़ीसा पुलिस की गोलीबारी में शहीदों को श्रद्धाजंलि देगें.

बता दें कि गुलामी की जंजीरों को तोड़ देश अभी चलना शुरु ही किया था कि आजाद भारत का पहला जनसंहार झारखंड में देखने को मिला  एक जनवरी 1948 का वह दिन किसी भी झारखंडी के दिलो दिमाग से निकल नहीं सकता. जब मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में करीबन 50 हजार आदिवासी स्टील सिटी जमशेदपुर से साठ किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी बहुल कस्बा खरसांवा को उड़ीसा में शामिल होने का विरोध करने के लिए जुटे थें .उस दिन साप्ताहिक हाट भी था. इसलिए भीड़ और भी ज्यादा थी.

आदिवासियों के इस विरोध प्रर्दशन को देखते हुए उड़ीसा सरकार ने पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया और बिल्कुल अंग्रेजी सरकार के नक्शे कदम पर चलते हुए आदिवासियों पर गोली चला दिया.  इस गोलीकांड में कितने लोग मारे गए, इसको लेकर अलग-अलग दावे है.

अनुज कुमार सिन्हा की पुस्तक ‘झारखंड आंदोलन के दस्तावेज़: शोषण, संघर्ष और शहादत’ में इस गोलीकांड पर विस्तार पूर्वक चर्चा की गई है. पूर्व सांसद और महाराजा पीके देव की किताब ‘मेमोयर ऑफ ए बायगॉन एरा‘ के मुताबिक इस गोलीकांड में करीबन दो हज़ार लोग मारे गए थें. अंग्रेजी अख़बार द स्टेट्समैन ने इस गोलीकांड के बारे में लिखा था कि “35 आदिवासी किल्ड इन खरसावां” और यह खबर भी गोलीकांड के तीन दिन बाद छपी थी.

दरअसल उड़ीसा सरकार सराइकेला और खरसावां स्टेट को उड़िया भाषी होने के नाम पर उड़ीसा में मिलाना चाहती थी और यही विवाद का विषय था. यहां का राजा भी उड़िसा में मिलना चाहता था , इलाके की आदिवासी जनता की राय इससे अलग थी. आदिवासियों की मांग न तो उड़ीसा में शामिल होने की थी और न ही बिहार में.  पूरे कोल्हान इलाके से आदिवासी झुण्ड के झुण्ड बनाकर अपने प्रिय नेता जयपाल सिंह मुंडा को सुनने पहुंचे थें.

यह वह दौर था जब जयपाल सिंह मुंडा अलग झारखणंड राज्य का नारा लगा रहे थें. झारखंड की जनता जयपाल सिंह को अपनी आवाज मान रही थी. यही कारण था कि जयपाल सिंह मुंडा के आने के पहले ही सभा स्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई. नारेबाजी के बीच जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक गोली चलनी शुरु हो गई. लोगों की लाशें गिरने लगी, बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए. अभी जो शहीद स्थल है उस जगह पर राजा रामचंद्र सिंहदेव का बनाया हुआ एक बड़ा कुआं था. इस कुंए में  सिर्फ मृतकों को ही नहीं बल्कि अधमरों को भी फेंक दिया गया.

अनुज कुमार सिन्हा अपनी किताब में इस गोली कांड में घायल एक शख्स साधु चरण बिरुआ की आपबीती लिखते हैं. साधु चरण को कई गोलियां लगी थीं. इस दर्द में पता ही नहीं चला कि एक गोली उनके बांह में लगी है. गोली लगने के 54 साल बाद बांह में दर्द हुआ और गोली धीरे-धीरे बाहर आने लगी, तब उस गोली को निकाला गया.

अब झारखण्ड का राजनीतिक तीर्थस्थान है खरसांवा, हर वर्ष लगता है नेताओं का जमघट   

अलग राज्य के रुप में  झारखंड के अस्तित्व में आने के साथ ही खरसांवा झारखंड का राजनीतिक तीर्थ बन कर उभरा है. अब हर राजनीतिक दल शहीद स्मारक पर जाकर शहीदों को माल्यार्पण जरुर करती है. अब खरसावां शहीद स्थल को एक पार्क के रुप में तब्दील कर दिया गया है.  एक जनवरी को शहीद स्थल पर आदिवासी रीति-रिवाज से पूजा की जाती है तो दूसरी तरफ  झारखंड के सभी बड़े राजनीतिक दल और आदिवासी संगठनों की ओर से कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है.

अभी विजय सिंह बोदरा शहीद स्थल के पुरोहित हैं. उनका परिवार ही यहाँ पीढ़ियों से पूजा कराता आ रहा है. विजय ने बताया, “एक जनवरी को शहीदों के नाम पर पूजा की जाती है.  लोग श्रद्धाजंलि देते है. फूल-माला के साथ चावल के बना रस्सी चढ़ा कर पूजा की जाती है. शहीद स्थल पर तेल भी चढ़ाया जाता है.

 

 

 

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