1971 भारत पाकिस्तान युद्ध में बैटल ऑफ बसंतर के नायक मेजर होशियार सिंह दहिया की कहानी, जिन्होंने घायल होकर भी दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर किया।
Major Hoshiar Singh: 1971 युद्ध और बैटल ऑफ बसंतर की पृष्ठभूमि
रांची: 1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध केवल दो देशों के बीच सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दक्षिण एशिया के इतिहास को बदल देने वाला युद्ध साबित हुआ। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान द्वारा भारतीय हवाई अड्डों पर हमले के बाद भारत ने पूर्ण सैन्य कार्रवाई शुरू की। यह युद्ध पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर लड़ा गया। पश्चिमी मोर्चे पर शकरगढ़ सेक्टर रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहां से पाकिस्तान सियालकोट के जरिए भारत के उत्तरी क्षेत्रों पर दबाव बना सकता था। इसी क्षेत्र में बहने वाली बसंतर नदी के किनारे निर्णायक टैंक युद्ध हुआ, जिसे इतिहास में बैटल ऑफ बसंतर के नाम से जाना जाता है।
Major Hoshiar Singh: मेजर होशियार सिंह दहिया का सैन्य सफर
मेजर होशियार सिंह दहिया का जन्म 5 मई 1937 को हरियाणा के सोनीपत जिले के सिसाना गांव में हुआ। किसान परिवार से आने वाले होशियार सिंह पढ़ाई और खेल दोनों में अव्वल थे। वॉलीबॉल में उनकी प्रतिभा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। वर्ष 1957 में उन्होंने जाट रेजीमेंट में सैनिक के रूप में भारतीय सेना जॉइन की और 1963 में ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में अधिकारी बने। 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध में बीकानेर सेक्टर में उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मेंशन इन डिस्पैचेस से सम्मानित किया गया।
Key Highlights
1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में बैटल ऑफ बसंतर के निर्णायक नायक
घायल होने के बाद भी मोर्चे पर डटे रहे मेजर होशियार सिंह
गनर के शहीद होने पर खुद संभाली मशीन गन
तीन ग्रेनेडियर्स की अगुवाई करते हुए पाकिस्तानी हमलों को किया विफल
जीवित रहते परमवीर चक्र पाने वाले चुनिंदा भारतीय अधिकारी
Major Hoshiar Singh:घायल होकर भी मोर्चे पर डटे रहे, बना इतिहास
15 और 16 दिसंबर 1971 की रात थ्री ग्रेनेडियर्स को बसंतर नदी पार कर जरपाल गांव पर कब्जा करने का आदेश मिला। चारों ओर बारूदी सुरंगें, पाकिस्तानी टैंक और भारी गोलाबारी के बीच मेजर होशियार सिंह ने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। कब्जे के बाद पाकिस्तानी सेना ने लगातार कई टैंक और पैदल हमले किए। इस दौरान मेजर होशियार सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने मोर्चा छोड़ने से इनकार कर दिया। जब उनके गनर शहीद हो गए, तब उन्होंने खुद मशीन गन संभाली और दुश्मन पर जबरदस्त हमला किया। उनके नेतृत्व और साहस से पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान हुआ और सैकड़ों सैनिक हताहत हुए। अंततः पाकिस्तान को पीछे हटना पड़ा और यही जीत 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण की भूमिका बनी।
युद्ध के बाद मेजर होशियार सिंह दहिया को उनके अद्वितीय साहस, नेतृत्व और बलिदान के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वह उन गिने चुने भारतीय अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें जीवित रहते यह सर्वोच्च सैन्य सम्मान प्राप्त हुआ। 1988 में सेवानिवृत्ति और 1998 में उनके निधन के बावजूद उनकी कहानी आज भी भारतीय सेना और देश के युवाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
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