Jharkhand Delimitation: परिसीमन पर झारखंड में सियासी हलचल, नेताओं ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी

Jharkhand Delimitation: झारखंड में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के प्रस्तावित परिसीमन (delimitation) के संभावित असर पर चर्चा करने के लिए रविवार को राजधानी रांची के प्रेस क्लब में सर्वदलीय बैठक हुई। इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों, पूर्व जनप्रतिनिधियों और आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक में अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों और राज्य के हितों से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि झारखंड एक अनुसूचित क्षेत्र और आदिवासी-बहुल राज्य है, जहाँ संविधान की पाँचवीं अनुसूची, PESA एक्ट और आदिवासी समुदाय के ऐतिहासिक अधिकारों का विशेष महत्व है। इसलिए, परिसीमन प्रक्रिया के दौरान अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कोई भी कमी सामाजिक न्याय के सिद्धांतों और संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगी।

आरक्षित सीटों में कटौती का विरोध; आंदोलन की चेतावनी

बैठक की अध्यक्षता करते हुए पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि अगर परिसीमन प्रक्रिया के कारण अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित विधानसभा या लोकसभा सीटों में कोई कमी आती है, तो इसका लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा। उन्होंने घोषणा की कि आदिवासी समुदाय अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक संगठित आंदोलन शुरू करेगा और लोगों से अपील की कि वे 2 अगस्त, 2026 को रांची में प्रस्तावित “आदिवासी एकता महाजुटान रैली” में बड़ी संख्या में शामिल हों।

विभिन्न दलों का समर्थन

CPI (ML) के प्रतिनिधि सुविन्दु सेन ने कहा कि उनकी पार्टी आदिवासी समुदाय की जायज़ मांगों के साथ मजबूती से खड़ी है। वहीं, भारतीय आदिवासी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रेमशाही मुंडा ने कहा कि औद्योगीकरण और शहरीकरण ने राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना को बदल दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि परिसीमन के दौरान अनुसूचित जनजाति के लिए मौजूदा आरक्षित सीटों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए, और यदि सीटों की कुल संख्या बढ़ती है, तो आदिवासी आरक्षित सीटों में भी उसी अनुपात में वृद्धि होनी चाहिए। आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक शशि पन्ना ने कहा कि मौजूदा स्वरूप में परिसीमन लागू करने से आदिवासी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी कमज़ोर हो सकती है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 330(2) और 332(3) में आवश्यक संशोधन करके आदिवासी आरक्षित सीटों को सुरक्षित रखने का सुझाव दिया।

पारदर्शी परिसीमन और संवैधानिक अधिकारों पर ज़ोर

बैठक के दौरान, झारखंड में आम आदमी पार्टी के प्रभारी राजेश लिंडा ने कहा कि उनकी पार्टी परिसीमन का विरोध नहीं करती है, लेकिन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह प्रक्रिया आदिवासी हितों का पूरा ध्यान रखते हुए की जानी चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल अमिताभ पन्ना ने कहा कि परिसीमन केवल जनसंख्या के आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक न्याय और ऐतिहासिक अधिकारों से गहराई से जुड़ा मुद्दा है। कांग्रेस के राज्य महासचिव राजीव रंजन प्रसाद सहित अन्य वक्ताओं ने कहा कि किसी भी स्थिति में झारखंड की सांस्कृतिक पहचान, पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों की भौगोलिक अखंडता और अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक अधिकारों को कमज़ोर नहीं किया जाना चाहिए।

संयुक्त प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंज़ूरी

बैठक के अंत में, सभी प्रतिभागियों ने सर्वसम्मति से संकल्प लिया कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। यह भी तय किया गया कि विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों के साथ लगातार बातचीत के ज़रिए एक संयुक्त रणनीति बनाई जाएगी। बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि झारखंड के संवैधानिक अधिकारों, अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों की अखंडता की रक्षा के लिए एक लोकतांत्रिक जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। साथ ही, 2 अगस्त 2026 को होने वाली “आदिवासी एकता महाजुटान रैली” की सफलता सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर जन-संपर्क अभियान भी चलाया जाएगा।

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