Jharkhand High Court Cyber Fraud: साइबर फ्रॉड में फ्रीज हुए 8,674 खाते, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला; जानें क्या है नई मांग

Jharkhand High Court Cyber Fraud: साइबर अपराध और डिजिटल बैंकिंग से जुड़े मामलों के बीच निर्दोष बैंक खाताधारकों को उनके खाते में अनजाने में पहुंचने वाली संदिग्ध रकम के कारण होने वाली परेशानी से बचाने की मांग को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी है। हाईकोर्ट के अधिवक्ता अच्युत स्वरूप मिश्रा ने यह याचिका दाखिल की है। याचिका में मांग की गयी है कि केवल संदिग्ध लेनदेन के आधार पर निर्दोष खाताधारकों को पुलिस जांच, बैंक खाता फ्रीज होने, नोटिस और आपराधिक कार्रवाई जैसी परेशानियों से बचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार की जाए। प्रार्थी के अनुसार, पिछले वर्ष संदिग्ध लेनदेन के आरोप में 8,674 बैंक खाते फ्रीज किये गये थे। उनका कहना है कि इनमें ऐसे खाताधारक भी हो सकते हैं, जिन्हें संबंधित लेनदेन की जानकारी तक नहीं थी।

केवल खाते में रकम आने से अपराध साबित नहीं

याचिका में कहा गया है कि मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था में लेनदेन की सुरक्षा के लिए ओटीपी, पिन और दो-स्तरीय प्रमाणीकरण जैसी कई व्यवस्थाएं हैं। हालांकि, यदि कोई अज्ञात व्यक्ति किसी निर्दोष नागरिक के खाते में उसकी जानकारी या सहमति के बिना रकम भेज देता है, तो ऐसे खाताधारक के लिए समान रूप से प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था का अभाव है। प्रार्थी का तर्क है कि केवल किसी व्यक्ति के बैंक खाते में रकम जमा होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि खाताधारक को इसकी जानकारी थी या उसने लेनदेन को अधिकृत किया था। याचिका के अनुसार, ऐसे मामलों में खाताधारक की जानकारी, सहमति, लेनदेन पर उसका नियंत्रण, उससे प्राप्त लाभ और आपराधिक मंशा जैसे पहलुओं का स्वतंत्र रूप से निर्धारण किया जाना जरूरी है।

बैंक खाते का इस्तेमाल और अपराध में शामिल होना अलग

याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि किसी बैंक खाते का साइबर अपराध में इस्तेमाल होना और खाताधारक का खुद उस अपराध में शामिल होना अलग-अलग बातें हैं। प्रार्थी ने निर्दोष खाताधारकों को केवल संदिग्ध लेनदेन के आधार पर होने वाली कार्रवाई से राहत देने के लिए स्पष्ट और प्रभावी प्रक्रिया तैयार करने की मांग की है।

RBI के सामने तकनीकी व्यवस्था का प्रस्ताव

अधिवक्ता अच्युत स्वरूप मिश्रा ने भारतीय रिजर्व बैंक के सामने एक तकनीकी व्यवस्था विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा है। इसके तहत संदिग्ध, असामान्य, अधिक जोखिम वाले या अज्ञात स्रोत से आने वाले लेनदेन पर प्राप्तकर्ता को तत्काल डिजिटल सूचना भेजने की व्यवस्था की जा सकती है। प्रस्ताव के अनुसार, खाताधारक से पूछा जा सकता है कि वह संबंधित लेनदेन को पहचानता है और उसे अधिकृत करता है या नहीं। स्वीकृति मिलने के बाद ओटीपी अथवा अन्य सुरक्षित प्रमाणीकरण के माध्यम से लेनदेन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

‘लेनदेन नहीं पहचानता’ विकल्प से बनेगा रिकॉर्ड

यदि खाताधारक संबंधित लेनदेन को पहचानने से इनकार करता है, तो तत्काल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार कर उस लेनदेन को धोखाधड़ी-समीक्षा प्रक्रिया में भेजा जा सकता है। प्रार्थी का कहना है कि ऐसी व्यवस्था लागू होने से निर्दोष खाताधारकों को अनावश्यक परेशानी से बचाने में मदद मिल सकती है। साथ ही संदिग्ध लेनदेन की पहचान और साइबर अपराध की जांच को भी अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

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