Mandar GI Tag Jharkhand, गुमला: झारखंड की लोक संस्कृति और आदिवासी जीवन से गहराई से जुड़े पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर को ‘मांदर ऑफ झारखंड’ के नाम से जीआई पंजीकरण मिलने के बाद गुमला जिले के रायडीह प्रखंड स्थित जरजट्टा गांव के कारीगरों में उत्साह है। पीढ़ियों से मांदर बनाने वाले कारीगरों को उम्मीद है कि इस पहचान से उनके पारंपरिक हुनर को बड़ा बाजार मिलेगा और उनकी आजीविका के अवसर बढ़ेंगे। मांदर के लिए जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया 24 सितंबर 2021 को आवेदन के साथ शुरू हुई थी। जीआई रजिस्ट्री के अनुसार आवेदन में रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, ग्राम जरजट्टा को आवेदक के रूप में दर्ज किया गया था। 28 सितंबर 2026 को मांदर को जीआई पंजीकरण मिला।
जीआई टैग से कारीगरों को बाजार बढ़ने की उम्मीद
जरजट्टा गांव में मांदर निर्माण से जुड़े कारीगरों का कहना है कि इस पारंपरिक वाद्य को आधिकारिक पहचान मिलने से इसकी मांग बढ़ सकती है। महरंग राम और गुलाब घासी जैसे कारीगरों को उम्मीद है कि अब मांदर को झारखंड से बाहर भी नए बाजार मिलेंगे। कारीगर लंबे समय से सीमित संसाधनों के बीच मांदर तैयार करने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कई परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस काम से जुड़ी है। ऐसे में जीआई पहचान को वे अपने पारंपरिक हुनर के लिए नई संभावनाओं के रूप में देख रहे हैं। कारीगरों का कहना है कि यदि प्रशासन और सरकार की ओर से बाजार, प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और बिक्री के बेहतर माध्यम उपलब्ध कराए जाएं तो मांदर निर्माण को रोजगार के बड़े साधन के रूप में विकसित किया जा सकता है।
चार पीढ़ियों से जारी है मांदर बनाने का हुनर
जरजट्टा में मांदर निर्माण की परंपरा नई नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार गांव में करीब 25 कारीगर परिवार इस काम से जुड़े हैं और यह कला चार पीढ़ियों से परिवारों में चली आ रही है। कारीगर चुन्नू नायक और मंगरी देवी के मुताबिक, जरजट्टा में कई परिवार पारंपरिक तरीके से मांदर तैयार करते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और रोजी-रोटी का हिस्सा है। मांदर बनाने में लकड़ी, चमड़े, मिट्टी और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इसे तैयार करने में समय और मेहनत दोनों लगते हैं। कारीगरों के मुताबिक, मेहनत अधिक होने के बावजूद कई बार उन्हें अपने उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

‘मांदर ऑफ झारखंड’ के नाम से मिली आधिकारिक पहचान
भारत सरकार की भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने मांदर को ‘मांदर ऑफ झारखंड’ के नाम से पंजीकृत किया है। आवेदन में इसे हस्तशिल्प श्रेणी में रखा गया है और मांदर निर्माण से जुड़े पारंपरिक कारीगरों की जानकारी भी शामिल की गई है। जीआई प्रक्रिया में मांदर की विशिष्ट बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक और झारखंड के जनजातीय जीवन से इसके संबंध को प्रमाणित करने वाले दस्तावेज पेश किए गए। ऐतिहासिक अभिलेखों और शोध सामग्री को भी इसके सांस्कृतिक संबंध के प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इस पहचान से मांदर की प्रामाणिकता को औपचारिक आधार मिलने के साथ इसके पारंपरिक निर्माण से जुड़े कारीगरों की पहचान मजबूत होने की उम्मीद है।

प्रशासन को संरक्षण और बाजार विस्तार की उम्मीद
गुमला के उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने मांदर को जीआई पंजीकरण मिलने पर खुशी जताई है। उन्होंने इसे झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय कारीगरों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। बुधवार को जरजट्टा पंचायत में आयोजित सम्मान समारोह में मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से जुड़े लोगों और कारीगरों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित भी किया गया। जिला प्रशासन के अनुसार, जीआई पहचान मिलने से मांदर की ब्रांडिंग और बाजार विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। जरजट्टा के अलावा मांदर निर्माण से जुड़े दूसरे इलाकों में भी कारीगरों को प्रशिक्षण देने की दिशा में काम हुआ है। अब कारीगरों की नजर इस बात पर है कि जीआई पहचान का लाभ जमीन पर किस तरह मिलता है। बेहतर बाजार, प्रशिक्षण और बिक्री के अवसर उपलब्ध होने पर यह पारंपरिक कला स्थानीय परिवारों के लिए आय का मजबूत साधन बन सकती है। मांदर की थाप झारखंड के सरहुल, करमा और सोहराय जैसे पर्वों, लोकनृत्य और सामाजिक आयोजनों से जुड़ी रही है। ऐसे में जीआई पंजीकरण को कारीगर अपनी पीढ़ियों पुरानी कला और सांस्कृतिक विरासत की औपचारिक पहचान के रूप में देख रहे हैं।

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