रांचीः खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा भी बंदे से पूछे तेरी रजा क्या है, इस वाकये को सच साबित कर दिखाया है झारखण्ड की महिलाओं ने। जिस तरह देश में पहली बार महिलाओं ने वायु सेना में शामिल होकर इतिहास रचा ठीक उसी तरह झारखंड में महिलाएं भी कोल खदानों में बड़ी बड़ी गाड़ियां पहली बार चला कर इतिहास रच रहीं हैं।
राजधानी रांची में महिलाओं की सुरक्षित यात्रा के लिए पिंक ऑटो की शुरुआत 7 वर्ष पहले की गई। महिलाओं ने घर की दहलीज पार कर ऑटो चलाने की शुरूआत की तो कई मुश्किलें सामने आयी। मगर बाधाओं के बावजूद महिलाऐं डटी रहीं, और फिर धीरे- धीरे इनकी संख्या भी बढ़ने लगी।

30 से 35 हजार प्रतिमाह है कमाई
पिंक ऑटो से शुरूआत के बाद महिलाओं की हिम्मत बढ़ी तो फिर अगले पड़ाव के तौर पर महिलाओं ने कोल खदानों के उबड़ खाबड़ रास्तों पर हाइवा ट्रकों का परिचालन कर कीर्तिमान ही रच दिया। दर्जनों महिलाओं ने प्रशिक्षण लेने के बाद हाइवा चलाना शुरू किया और आज वो 30 से 35 हजार प्रतिमाह कमा रहीं हैं। उन्हें देखकर पिंक आटो चालकों का भी हौसला बढ़ गया है।
ऑटो चलाकर बेटे को कराया होटल मैनेजमंट
पिंक ऑटो चलाने वाली महिलाओं का कहना है कि अपने पैरों पर खड़े होने का अहसास ही उन्हें उर्जा देता है। पिंक ऑटो चालक सुमन का कहना है कि उसके पति की मौत के बाद उसके सामने पूरे परिवार को पालने की जिम्मेदारी थी। उसने हिम्मत नहीं हारी और ऑटो चलाकर ही अपने बेटे को होटल मैनेजमेंट का कोर्स कराया जो आज ओमान में जॉब कर रहा है।
रोजगार का एक नया विकल्प
महिलाओं ने हिम्मत दिखाते पहल की तो रोजगार का एक नया विकल्प सामने आ गया, मगर सरकार से किसी तरह की मदद का ना मिल पाना उन्हें पीड़ा भी देता है। महिलाऐं चाहती हैं कि उनके नाम से वाहनों का रजिस्ट्रेशन हो और उन्हें हर रूट में प्राथमिकता दी जाए, जिससे ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका मिल सके।
महिलाओं को मौका मिला तो पिंक ऑटो के जरिये स्वरोजगार के क्षेत्र में लंबी लकीर खींच डाली, महिलाओं ने कोल खदानों में हाइवा चलाकर साबित कर दिया है कि हिम्मत हौसले और कार्यकुशलता में कहीं से भी पुरूषों से पीछे नहीं हैं। ऐसे में जरूरत है कि समाज और सरकार दोनों की तरफ से उनके जज्बे को सलाम करते हुए उनका हौसला बढ़ाया जाए, ताकि उन्हें भी अपने पैरों पर खड़े होकर सम्मानपूर्ण जीवन जीने का मौका मिल सके।
रिपोर्ट-मदन सिंह
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