राजगीर में अनोखा नजारा, बिना पासपोर्ट-वीजा पहुंचे यूरोप-मध्य एशिया के मेहमान

पटना : राजगीर की पहाड़ियां, घने वन क्षेत्र और शांत वादियां अब केवल देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों को ही आकर्षित नहीं कर रहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर का सफर तय कर आने वाले प्रवासी पक्षियों को भी अपना बना रही हैं। इस ठंड के मौसम में राजगीर का आकाश और जंगल यूरोप, रूस, मध्य एशिया और साइबेरिया से आए प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट से गूंज उठा है।

इस बार प्रवासी पक्षियों की संख्या अब तक के सभी रिकॉर्ड को पीछे छोड़ती दिखाई दे रही है। हाल ही में वन विभाग द्वारा राजगीर जू सफारी, नेचर सफारी और इससे सटे वन्यप्राणी आश्रयणी क्षेत्रों में कराए गए विस्तृत पक्षी सर्वेक्षण ने इस बात की पुष्टि की है कि राजगीर पर्वतीय क्षेत्र पक्षियों की असाधारण जैव विविधता का समृद्ध केंद्र बन चुका है।

2 चरणों में हुआ सर्वे, बढ़ती विविधता ने चौंकाया

पक्षी सर्वेक्षण दो चरणों में किया गया। पहला चरण फरवरी 2025 में आयोजित हुआ, जिसमें पक्षियों की कुल 109 प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें 29 प्रवासी पक्षी शामिल थे। इस दौरान मध्य एशिया से आने वाली दुर्लभ वॉर्बलर प्रजातियां-सल्फर-बेलिड वॉर्बलर, येलो-ब्राउड वॉर्बलर और टिकेल्स लीफ वॉर्बलर का अवलोकन किया गया। इसके अलावा इंडियन वल्चर और ग्रिफॉन वल्चर की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि राजगीर की पहाड़ियां संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों के लिए भी एक सुरक्षित आश्रय स्थल बन रही हैं।

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दूसरा चरण दिसंबर 2025 में राजगीर की आसपास की पहाड़ियों में कराया गया, जिसमें पक्षियों की संख्या और भी बढ़ी

दूसरा चरण दिसंबर 2025 में राजगीर की आसपास की पहाड़ियों में कराया गया, जिसमें पक्षियों की संख्या और भी बढ़ी। इस सर्वे में कुल 135 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें 33 प्रवासी पक्षी शामिल थे। इस चरण का सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन ‘यूरेशियन स्पैरोहॉक’ का था, जिसे नालंदा जिले में पहली बार दर्ज किया गया। यह खोज इस बात का प्रमाण है कि राजगीर का क्षेत्र यूरोप और मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप तक फैले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी मार्गों से जुड़ा हुआ है।

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शिकारी पक्षियों से लेकर दुर्लभ थ्रश तक

सर्वेक्षण में स्केली थ्रश, ऑरेंज-हेडेड थ्रश, टिकेल्स थ्रश, इंडियन पिट्टा, लार्ज हॉक-कुक्कू और साइबेरियन स्टोनचैट जैसी महत्वपूर्ण शीतकालीन प्रवासी प्रजातियां दर्ज की गईं। वहीं हिमालयन बजर्ड, बोनेलीज ईगल, ब्लैक-विंग्ड काइट, क्रेस्टेड हॉक ईगल, क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, लॉन्ग-लेग्ड बजर्ड और यूरेशियन केस्टरेल जैसे शक्तिशाली शिकारी पक्षियों की मौजूदगी ने राजगीर के पारिस्थितिक संतुलन को और मजबूत साबित किया।

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वॉर्बलर प्रजातियों की भरमार बनी खास पहचान

इस सर्वेक्षण की एक बड़ी खासियत वॉर्बलर प्रजातियों की असाधारण विविधता रही। धान के खेतों, दलदली आर्द्रभूमियों, सरकंडों वाले इलाकों, झाड़ीदार भूमि और जंगलों की कगारों पर कुल 11 वॉर्बलर प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें बूटेड वॉर्बलर, पैडीफील्ड वॉर्बलर, ब्लाइथ्स रीड वॉर्बलर, सल्फर-बेलिड वॉर्बलर, डस्की वॉर्बलर, येलो-ब्राउड वॉर्बलर, टिकेल्स लीफ वॉर्बलर, कॉमन चिफचाफ, ग्रीनिश वॉर्बलर, ह्यूम्स वॉर्बलर और क्लैमरस रीड वॉर्बलर शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह विविधता स्वस्थ कीट जीवन, कम रासायनिक प्रदूषण और विविध आवासों की मौजूदगी का स्पष्ट संकेत है।

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साइबेरिया और टुण्ड्रा से भी पहुंचे मेहमान

सर्वेक्षण में पिन-टेल्ड स्नाइप की मौजूदगी भी दर्ज की गई, जो उत्तरी रूस और साइबेरिया की आर्द्रभूमियों व टुण्ड्रा क्षेत्रों में प्रजनन करता है और सर्दियों में भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर प्रवास करता है। इसके अलावा टिकेल्स ब्लू फ्लायकैचर, इंडियन पैराडाइज फ्लायकैचर, ब्लू-थ्रोटेड ब्लू फ्लायकैचर, टैगा फ्लायकैचर और रेड-ब्रेस्टेड फ्लायकैचर जैसे प्रवासी पक्षी भी पाए गए, जो स्वस्थ और निरंतर वन आवासों पर निर्भर करते हैं।

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धान के खेत भी बने प्रवासी पक्षियों का आश्रय

विशेष रूप से पैडीफील्ड वॉर्बलर की उपस्थिति उल्लेखनीय रही, जो धान के खेतों और दलदली घासभूमि से जुड़ा प्रवासी पक्षी है। इसकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि पारंपरिक कृषि पद्धतियां भी प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि का काम कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज बदलते प्रवासी पैटर्न और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में भी सहायक होगी।

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राजगीर की बढ़ती पारिस्थितिक पहचान

राजगीर जू सफारी के निदेशक राम सुन्दर एम के अनुसार, यह निष्कर्ष राजगीर वन्यजीव अभयारण्य की पारिस्थितिक महत्ता को उजागर करते हैं। उन्होंने बताया कि सफारी गाइडों को प्रवासी पक्षियों की पहचान और जानकारी देने का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि पर्यटकों को इस समृद्ध जैव विविधता से परिचित कराया जा सके। वन विभाग द्वारा लगातार किए जा रहे मृदा और नमी संरक्षण कार्यों से जलाशयों में जल स्तर बेहतर हुआ है, जिससे प्रवासी पक्षियों के लिए आदर्श प्रवास विकसित हुआ है।

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