Amit Shah on New Criminal Law : केंद्रीय गृह मंत्री बोले – नए कानूनों से अब लोगों को न्याय मिलेगा, दंड नहीं

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को कहा कि औपनिवेशिक कानून का दौर अब खत्म हो गया है। अब देश में दंड की जगह न्याय मिलेगा और देरी की जगह त्वरित सुनवाई होगी। साथ ही राजद्रोह कानून को भी खत्म कर दिया गया है।

डिजीटल डेस्क : Amit Shah on New Criminal Lawकेंद्रीय गृह मंत्री बोले नए कानूनों से अब लोगों को न्याय मिलेगा, दंड नहीं। देश में सोमवार से तीन नए आपराधिक कानून का राज बहाल कर दिया गया है। इसी के साथ देश में अब से सभी नई एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत दर्ज की जाएंगी। जो मामले 1 जुलाई से पहले दर्ज हुए हैं उनके अंतिम निपटारा होने तक उन केसों में पुराने कानूनों के तहत केस चलते रहेंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को कहा कि औपनिवेशिक कानून का दौर अब खत्म हो गया है। अब देश में दंड की जगह न्याय मिलेगा और देरी की जगह त्वरित सुनवाई होगी। साथ ही राजद्रोह कानून को भी खत्म कर दिया गया है। देश की जनता को केंद्रीय गृह मंत्री बहुत-बहुत बधाई देते हुए कहा कि आजादी के 77 साल बाद आपराधिक न्याय प्रणाली अब पूरी तरह से स्वदेशी हो रही है और भारतीय मूल्यों के आधार पर चलेगी। 75 साल बाद इन कानूनों पर विचार किया गया। पहले सिर्फ पुलिस के अधिकार सुरक्षित थे लेकिन अब पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं के अधिकार भी सुरक्षित होंगे।

4 साल की लंबी चर्चा के बाद देश में लागू हुए सभी नए कानून

राजद्रोह कानून को खत्म किए जाने पर अमित शाह ने कहा कि राजद्रोह एक ऐसा कानून था, जिसे अंग्रेजों ने अपने शासन की रक्षा के लिए बनाया था। महात्मा गांधी,  बाल गंगाधर तिलक और सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इसी कानून के तहत 6-6 साल की सजा काटी थी। उसी कानून के तहत पंजाब केसरी लाला लाजपत रॉय पर प्रतिबंध भी लगाया गया था लेकिन उस राजद्रोह कानून को खत्म कर दिया ​है और उसकी जगह देश-विरोधी हरकतों के लिए नई धारा लागू की गई है। नए कानूनों को लेकर विपक्ष की ओर से किए जा रहे हमले पर अमित शाह ने कहा कि संहिता को लेकर विपक्ष के कुछ दोस्त अलग-अलग बातें मीडिया के सामने रख रहे हैं कि अभी ट्रेनिंग नहीं हुई है, चर्चा नहीं हुई है जबकि सच्चाई यही है कि लोकसभा में 9 घंटा 34 मिनट चर्चा हुई जिसमें 34 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इसी तरह राज्यसभा में 7 घंटा 10 मिनट चर्चा हुई जिसमें 40 सदस्यों ने हिस्सा लिया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि देश की आजादी के बाद किसी भी कानून को पारित कराने के लिए इतनी लंबी चर्चा नहीं हुई है। बीते 4 साल तक इस कानून पर विचार हुआ और किसी को अभी भी कुछ कहना है, तो जरूर आए और वह सुनने को तैयार हैं लेकिन कृपया इन नए कानून को जनता की सेवा करने का मौका देना चाहिए। समय पर न्याय मिलेगा तो देश का भला होगा।

देश में अब सभी नई एफआईआर अब बीएनएस के तहत दर्ज होनी शुरू

देश में सोमवार 1 जुलाई को बड़े बदलाव के तहत 3 नए आपराधिक कानूनों का लागू होना भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए काफी दूरगामी बदलाव वाला माना जा रहा है। तीनों नए कानून ने अब ब्रिटिश कालीन कानूनों क्रमश: भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह ली है। अब से सभी नई एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत दर्ज की जाएंगी। एक जुलाई से पहले दर्ज मामलों के अंतिम निपटारे होने तक उन केसों में पुराने कानूनों के तहत केस चलते रहेंगे। नए क्रिमिनल कानूनों में महिलाओं, बच्चों और जानवरों से जुड़ी हिंसा के कानूनों को सख्त किया गया है। इसके अलावा कई दूसरे महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं जैसे खोज और बरामदगी की रिकॉर्डिंग, सभी पूछताछ और सुनवाई ऑनलाइन मोड में करना। आईपीसी यानी इंडियन पीनल कोड 1860 में, सीआरपीसी 1899 और इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 में बना था. विधेयक को बीते साल 2023 में संसद के दोनों सदनों में ध्वनिमत से पारित किया गया था। आईपीसी में जहां पहले 511 सेक्शन थे, वहीं अब भारतीय न्याय संहिता में 358 हैं। सीआरपीसी में 484 सेक्शन थे वहीं अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 हैं। इसी तरह इंडियन एविडेंस एक्ट में 166 थे लेकिन अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 170 सेक्शन हैं। नए भारतीय न्याय संहिता में नए अपराधों को शामिल गया है।

नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म के हर आरोपी को अब हो सकती है फांसी की सजा

शादी का वादा कर धोखा देने के मामले में 10 साल तक की जेल के अलावा नस्ल, जाति- समुदाय, लिंग के आधार पर मॉब लिंचिंग के मामले में आजीवन कारावास की सज़ा एवं महिलाओं और बच्चों से संबंधित अपराध अब भारतीय न्याय संहिता में धारा 63 से 97 तक हैं। रेप की धारा 375 अब नहीं रही। इसके स्थान पर अब धारा 63 है। भारतीय न्याय संहिता में धारा 63 में रेप की परिभाषा दी गई है और 64 से 70 में सजा का प्रावधान किया गया है। पहले आईपीसी में धारा 375 में रेप को परिभाषित किया गया था, जबकि 376 में सजा का प्रावधान था। आईपीसी की धारा 376 के तहत रेप का दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान था और अब बीएनएस की धारा 64 में भी यही सजा रखी गई है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 70 (1) के तहत किसी महिला के साथ गैंगरेप के अपराध में शामिल हर एक व्यक्ति को कम से कम 20 साल की सजा होगी। यह उम्रकैद तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी लगाया जाएगा जिसकी रकम पीड़ित महिला को दी जाएगी। नाबालिगों से दुष्कर्म में सख्त सजा कर दी गई है. बीएनएस के सेक्शन 70 (2) के मुताबिक अगर पीड़ित 18 साल से कम यानी नाबालिग है तो गैंगरेप में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को फांसी तक की सजा हो सकती है। पिछले कानून में यानी आईपीसी की धारा 376 डी और बी के तहत 12 साल से कम उम्र तक की नाबालिग से गैंगरेप करने पर फांसी और 12 साल से ऊपर की युवती से गैंगरेप के आरोपी को अधिकतम सजा आजीवन कारावस की हो सकती थी।

बालिग नहीं नाबालिग से मैरिटल रेप होगा अपराध के दायरे में

मैरिटल रेप का मुद्दा भारतीय न्यायिक परिचर्चा में लंबे समय से एक विवादास्पद विषय रहा है। देश में निर्भया रेप मामले के बाद जस्टिस वर्मा की कमेटी ने भी मैरिटल रेप के लिए अलग से कानून बनाने की मांग की थी एवं दलील दी थी कि शादी के बाद सेक्स में भी सहमति और असहमति को परिभाषित करना चाहिए। लागू भारतीय न्याय संहिता में मैरिटल रेप का जिक्र नहीं है। धारा 63 के अपवाद ( 2) में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती यौन संबंध बनाता है तो इसे रेप नहीं माना जाएगा। बशर्ते पत्नी की उम्र 18 साल से ज्यादा हो। साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने महिला की आयु 18 साल कर दी थी यानी नाबालिग पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाना अपराध होगा। आईपीसी के पुराने नियम में धारा 375 में प्रावधान था कि अगर पत्नी की उम्र 15 साल से ज्यादा है तो जबरन संबंध बनाना रेप नहीं माना जाएगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ में 18 साल से कम उम्र में भी शादी की इजाजत है इसलिए नए प्रावधान का प्रमुख असर मुस्लिमों पर होगा।

झूठा वादा करके यौन संबंध बनाना भी अब हुआ संज्ञेय अपराध

आपराधिक कानून मे शादी का झूठा वादा करके सेक्स को खासकर से अपराध की श्रेणी में डाला गया है। इसके लिए 10 साल तक की सजा होगी। भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति शादी, रोजगार या छल करके महिला से यौन संबंध बनाता है तो ये अपराध होगा। इसके लिए दस साल तक की सजा बढ़ाई जा सकती है। साथ ही जेल और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इस धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति पहचान छिपाकर शादी करता है तो उस पर भी दस साल तक की सजा का नियम लागू होगा। हालांकि इस धारा के अंतगर्त आने वाले मामलों को रेप की कैटगरी से बाहर रखा गया है। पहले आईपीसी में शादी से झूठा वादा कर यौन संबंध बनाना, रोजगार या प्रमोशन का झूठा वादा करना और पहचान छिपाकर शादी करने जैसी चीजों के लिए कोई साफ- साफ प्रावधान नहीं था। अदालतें आईपीसी की धारा 90 के तहत इस तरह के मामलों को सुनती थी जहां झूठ के आधार पर ली गई सहमति को गलत माना जाता था। इ्स तरह के मामलों में आईपीसी की धारा 375 के तहत आरोप लगाए जाते थे और 10 साल तक जेल का प्रावधान था।

 

देश की जनता को केंद्रीय गृह मंत्री बहुत-बहुत बधाई देते हुए कहा कि आजादी के 77 साल बाद आपराधिक न्याय प्रणाली अब पूरी तरह से स्वदेशी हो रही है और भारतीय मूल्यों के आधार पर चलेगी।
अमित शाह सोमवार से लागू हुए नए कानूनों पर जानकारी देते हुए

शादीशुदा महिला को फुसलाना भी अब अपराध, दहेज हत्या मामले पूर्ववत

शादीशुदा महिला को फुसलाना भी अपराध माना गया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 84 के तहत अगर कोई शख्स किसी शादीशुदा महिला को फुसलाकर, धमाकर या उकासाकर अवैध संबंध के इरादे से ले जाता है को ये दंडनीय अपराध है। इसमें 2 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। इसी के साथ नए कानून के मुतबिक अगर शादी के सात सालों के अंदर किसी महिला की मौत जलने, शारीरिक चोट लगने या संदिग्ध परिस्थितियों में होती है और बाद में ये मालूम चले कि महिला की मौत का जिम्मेदार उसका पति, पति के रिश्तेदारों की तरफ से उत्पीड़न तो उसे दहेज हत्या माना जाएगा। भारतीय न्याय संहिता में धारा 79 में दहेज हत्या को परिभाषित किया गया है और सजा में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है। यानी जिस तरह की सजा की व्यवस्था आईपीसी में थी ठीक वही सजा का प्रावधान नई भारतीय न्याय संहिता में भी है। आईपीसी की धारा 304बी के तहत कम से कम सात साल कैद की सज़ा की बात है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।

फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाना अब अनिवार्य, एडल्ट्री अब अपराध नहीं

भारतीय न्याय संहिता में एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। एडल्ट्री को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 497 को जिसमें एडल्ट्री के नियमों को बताया गया है उसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में मनमाना होने और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया था। एडल्ट्री पर कानून 1860 में बना था। आईपीसी की धारा 497 में इसे परिभाषित करते हुए कहा गया था कि अगर कोई मर्द किसी दूसरी शादीशुदा औरत के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, तो महिला के पति की शिकायत पर इस मामले में पुरुष को एडल्ट्री कानून के तहत आरोप लगाकर मुकदमा चलाया जा सकता था। ऐसा करने पर पुरुष को पांच साल की कैद और जुर्माना या फिर दोनों ही सजा का प्रवाधान भी था। नए बदले हुए कानून में जांच-पड़ताल में अब फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाने को अनिवार्य बनाया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी का ज्यादा इस्तेमाल, जैसे खोज और बरामदगी की रिकॉर्डिंग, सभी पूछताछ और सुनवाई ऑनलाइन मॉड में करना आदि बदलावों का विशेषज्ञों ने स्वागत भी किया है। एफआईआर, जांच और सुनवाई के लिए अनिवार्य समय-सीमा तय की गई है। अब सुनवाई के 45 दिनों के भीतर फैसला देना होगा।  शिकायत के 3 दिन के भीतर एफआईआर दर्ज करनी होगी।

यौन उत्पीड़न वाले अपराध नए कानून में विस्तार से परिभाषित

नए कानून में यौन उत्पीड़न जैसे अपराध को धारा 74 से 76 के तहत परिभाषित किया गया है और ये कोई खास बदलाव नहीं किया गया है। आईपीसी में यौन उत्पीड़न के अपराधों को धारा 354 में परिभाषित किया गया था। साल 2013 में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद इस धारा में चार सब सेक्शन जोड़े गए थे  जिसमें अलग अलग अपराध के लिए अलग अलग सजा के प्रावधान थे। आईपीसी की धारा 354ए के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी महिला के साथ सेक्सुअल नेचर का शारीरिक टच करता है और मर्जी के खिलाफ पोर्न दिखाता है तो उसके लिए तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान था। 354 बी के तहत अगर कोई आदमी किसी महिला के जबरन कपड़े उतारता है या फिर ऐसा करने की कोशिश करता है तो ऐसे मामलों में तीन से सात साल तक की सजा के साथ जुर्माने का प्रावधान किया गया था। 354 सी के तहत महिला के प्राइवेट एक्ट को देखना, उसकी तस्वीरें लेना और प्रसारित करना अपराध था, जिसके लिए एक से तीन साल की सज़ा का प्रावधान था। अपराध दोहराने पर जुर्माने के साथ सजा बढ़कर तीन से सात साल तक हो जाती थी। नए कानून में धारा 77 के मुताबिक महिला का पीछा करने, मना करने के बावजूद बात करने की कोशिश, ईमेल या किसी दूसरे इंटरनेट संचार पर नजर रखने जैसे अपराधों को इसमें परिभाषित किया गया है, जिसमें आईपीसी की तरह ही सज़ा का प्रावधान है यानी कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस तरह की हरकतों को अपराध माना गया था। आईपीसी की धारा 354डी के तहत पहली बार इस तरह के अपराध करने पर जुर्माने के साथ सजा को तीन साल तक बढ़ाया जा सकता था और दूसरी बार अपराध करने पर जुर्माने के साथ सजा को पांच साल के लिए बढ़ाए जाने का प्रावधान था।

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