मनरेगा आंदोलन में कांग्रेस का ‘एकला चलो’ अभियान, राजद से किया किनारा, पंचायत से लेकर विधानसभा घेरने की तैयारी
पटना : बिहार की राजनीति में कांग्रेस और राजद के बीच विधानसभा चुनाव के दौरान पैदा हुई तल्खी अब मनरेगा आंदोलन के जरिए खुलकर सामने आ गई है। मनरेगा के कथित महत्वपूर्ण प्रावधानों को खत्म कर वीबी-जी राम जी योजना लागू करने के विरोध में कांग्रेस 8 जनवरी से राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करने जा रही है। खास बात यह है कि इस आंदोलन में कांग्रेस ने अपने पुराने सहयोगी राजद ही नहीं, बल्कि यूपीए के अन्य घटक दलों—भाकपा, माकपा, भाकपा माले और वीआईपी—को भी साथ नहीं लेने का फैसला किया है।
मनरेगा आंदोलन में कांग्रेस की ‘एकला चलो’ नीति
मनरेगा को लेकर कांग्रेस के अकेले आंदोलन में उतरने से यह संकेत साफ हो गया है कि बिहार में महागठबंधन अब केवल नाम का रह गया है। न तो राजद और न ही वाम दलों की ओर से मनरेगा के प्रावधानों में बदलाव के खिलाफ किसी बड़े आंदोलन की घोषणा की गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम महागठबंधन के औपचारिक अंत की ओर इशारा कर रहा है। हाल के दिनों में यूपीए घटक दलों के साझा मंच से किसी संयुक्त राजनीतिक कार्यक्रम की संभावना भी लगभग खत्म हो चुकी है।
झारखंड में झामुमो दे रहा कांग्रेस का साथ
दिलचस्प यह है कि पड़ोसी राज्य झारखंड में कांग्रेस के सहयोगी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने मनरेगा का नाम बदलकर वीबी-जी राम जी करने और उसके बदले प्रावधानों के खिलाफ आंदोलन का समर्थन किया है। झारखंड में कांग्रेस-झामुमो गठबंधन सरकार में साथ हैं, इसलिए वहां समन्वय दिख रहा है, जबकि बिहार में तस्वीर बिल्कुल उलट है।
11 जनवरी को उपवास, विधानसभा घेराव की तैयारी
कांग्रेस ने मनरेगा आंदोलन का पूरा रोडमैप तैयार कर लिया है और आगामी 8 जनवरी को प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में जिलाध्यक्षों की बैठक बुलाई है। वहीं 10 और 11 जनवरी को जिला मुख्यालयों में प्रेस वार्ता का कार्यक्रम के बाद गांधी या अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष दिनभर उपवास की भी योजना है। 12 से 29 जनवरी तक पंचायत स्तर पर जनसंपर्क अभियान चला कर जनता को इसकी खामियों से अवगत करायी जायेगी। वहीं 30 जनवरी को शहरी क्षेत्रों में वार्ड स्तर पर धरना देने का कार्यक्रम है। आगामी विधानसभा सत्र में पार्टी के द्वारा मुद्दा बनाते हुये विधानसभा घेराव की भी तैयारी की गई है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा
“राजद के साथ हमारा गठबंधन चुनाव तक सीमित था। अभी चुनाव नहीं चल रहा है, इसलिए सभी दल अपने-अपने कार्यक्रम कर रहे हैं। मनरेगा आंदोलन कांग्रेस का है। झारखंड में हम झामुमो के साथ सरकार चला रहे हैं, इसलिए वहां वे नैतिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं।”
राजनीतिक संदेश साफ
कांग्रेस के इस आंदोलन से यह संदेश साफ है कि बिहार में विपक्षी राजनीति अब साझा संघर्ष से अलग-अलग राह पर बढ़ रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मनरेगा जैसे बड़े मुद्दे पर कांग्रेस का ‘एकला चलो’ अभियान कितना असर दिखा पाता है।
क्या कांग्रेस की यह कवायद पार्टी को ज़िंदा रखने की कोशिश भर है?
मनरेगा आंदोलन को लेकर कांग्रेस का ‘एकला चलो’ अभियान अब राजनीतिक हलकों में अलग ही सवाल खड़े कर रहा है। जानकार मानते हैं कि यह आंदोलन सरकार से ज़्यादा कांग्रेस के अपने अस्तित्व की लड़ाई से जुड़ा दिखता है। लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरियों से जूझ रही कांग्रेस के लिए यह अभियान पार्टी को फिर से सक्रिय और प्रासंगिक दिखाने का प्रयास माना जा रहा है।
पहले भी उठी आवाज़, लेकिन नहीं बदली तस्वीर
यह पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस ने किसी बड़े जनमुद्दे को लेकर अलग राह चुनी हो। इससे पहले भी महंगाई, बेरोज़गारी और किसान जैसे मुद्दों पर ऐसे अभियान चले, लेकिन नतीजे ज़मीनी राजनीति में असरदार साबित नहीं हुए। यही वजह है कि मनरेगा आंदोलन को लेकर भी यह चर्चा तेज है कि क्या यह प्रयास भी पुराने प्रयोगों की तरह सीमित प्रभाव वाला साबित होगा।
सहयोगियों की दूरी ने बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किल
सबसे अहम बात यह है कि इस बार कांग्रेस के साथ न तो राजद है और न ही वाम दल। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सहयोगी दलों का इस आंदोलन से दूरी बनाना कांग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े करता है। माना जा रहा है कि विपक्षी खेमे में भी अब कांग्रेस की नेतृत्व क्षमता को लेकर संदेह गहराता जा रहा है।
नेतृत्व और दिशा को लेकर उठते सवाल
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि कांग्रेस के बार-बार असफल होते अभियानों के पीछे नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया की वही पुरानी शैली है। सहयोगी दल अब साझा मंच से आंदोलन करने के बजाय अपने-अपने रास्ते पर चलना ज़्यादा सुरक्षित मान रहे हैं, जिससे कांग्रेस का अलग-थलग पड़ना और स्पष्ट होता जा रहा है।
क्या यह आंदोलन भी सुर्खियों तक सिमट जाएगा?
मनरेगा जैसे बड़े और संवेदनशील मुद्दे पर आंदोलन जरूर सुर्खियां बटोर सकता है, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या कांग्रेस इसे जनसमर्थन में बदल पाएगी या यह भी पार्टी के उन प्रयासों में शामिल हो जाएगा, जो कुछ दिनों की राजनीतिक चर्चा के बाद ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
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