केले की फसल में लगने वाला फफूंदजनित रोग है पीला सिगाटोका

पटना : केला की फसल में लगने वाले पीला सिगाटोका रोग की पहचान एवं प्रबंधन को लेकर कृषि विभाग ने सलाह जारी की है। विभाग ने किसानों को इस सलाह में केले की फसल को इस रोग से बचाने के लिए उपाय बताएं हैं। विभाग ने कहा है कि केला फसल में पीला सिगाटोका रोग का प्रभाव देखा जाता है, जो एक फफूंदजनित रोग है। इस रोग के कारण केले के नए पत्ते की ऊपरी भाग पर हल्का पीला दाग या धारीदार लाइन के रूप में परिलक्षित होता है तथा बाद में ये धब्बे बड़े तथा भूरे रंग के हो जाते हैं, जिसका केंद्र हल्का कत्थई रंग का होता है।

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विभाग ने कहा- किसान पीला सिगाटोका के प्रबंधन के लिए प्रतिरोधी किस्म के पौधे लगाएं

इस रोग के प्रबंधन को लेकर विभाग ने कहा है कि किसान पीला सिगाटोका के प्रबंधन के लिए प्रतिरोधी किस्म के पौधे लगाएं। खेत को खरपतवार से मुक्त रखें। खेत से अधिक पानी की निकासी कर लें तथा एक किलोग्राम ट्राईकोडरमा विरिड को 25 किलोग्राम गोबर खाद के साथ प्रति एकड़ की दर से मिट्टी उपचार करें। इस रोग के कारण केले की फसल को क्षति पहुंचती है जिसके कारण किसानों की आय प्रभावित होती है।

केला उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ रहा है बिहार

केला उत्पादन में बिहार तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2004-05 में राज्य में केले की खेती 27,200 हेक्टेयर में होती थी, जो वर्ष 2022-23 में बढ़कर 42,900 हेक्टेयर हो गई है। इसी अवधि में केले का कुल उत्पादन 5.45 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 19.22 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता भी 20 मीट्रिक टन से बढ़कर 45 मीट्रिक टन हो गई है। इस प्रकार, वर्ष 2004-05 की तुलना में वर्ष 2022-23 में केले के रकबे, उत्पादन और उत्पादकता में क्रमशः 58 प्रतिशत, 261 प्रतिशत और 125 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

बिहार की इस उपलब्धि का श्रेय राज्य सरकार के कृषि रोड मैप और टिश्यू कल्चर तकनीक को जाता है

बिहार की इस उपलब्धि का श्रेय राज्य सरकार के कृषि रोड मैप और टिश्यू कल्चर तकनीक को जाता है। टिश्यू कल्चर से तैयार जी-9, मालभोग और चीनिया प्रभेदों के रोग मुक्त और उच्च उपज देने वाले पौधों ने उत्पादकता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। बिहार सरकार की फल विकास योजना के तहत फलों की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत टिश्यू कल्चर केले की खेती के लिए 1.25 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की इकाई लागत पर 50 प्रतिशत अनुदान (62,500 रुपए प्रति हेक्टेयर) उपलब्ध कराया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में इस योजना से 3,624 किसान लाभान्वित हुए हैं।

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