रांची: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से देश में “नोटा” (इनमें से कोई भी नहीं) का विकल्प शुरू हुआ, और तभी से एक नया ट्रेंड शुरू हो गया – “अगर आप नकारा महसूस कर रहे हैं तो हम आपको समझते हैं!” जी हां, नोटा के रूप में मतदाताओं को एक ऐसा विकल्प मिला, जो उन्हें उन उम्मीदवारों से बचने का मौका देता है, जिनसे वे परेशान हैं। झारखंड विधानसभा चुनाव में भी इसने अपने असर का पूरा प्रदर्शन किया, और नेताओं को यह एहसास कराया कि “हमारे पास एक और विकल्प भी है, आपको नकारने का!”
2014 में झारखंड विधानसभा चुनाव में 65 दलों ने अपनी किस्मत आजमाई, और क्या आपको पता है कि इनमें से 58 दलों को नोटा से भी कम वोट मिले? अब ये हालत देखकर कोई भी कह सकता है, “क्या करें, नेताओं ने भी उम्मीदवारी उसी तरह दी है, जैसे हम खाने का ऑर्डर देते हैं – या तो ज्यादा मसालेदार या फिर बिल्कुल ही फीका!” 2019 में यह और भी मजेदार हुआ, जब 88 दलों ने चुनाव में भाग लिया, और 81 पार्टियां तो नोटा से भी नीचे चली गईं! लगता है, जनता ने इसे अपना नया हथियार मान लिया है: “नोटा से भी कम वोट पाना अब और भी आसान है!”
देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां जैसे तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई, सीपीएम और आम आदमी पार्टी भी इस बार नोटा से पीछे रह गईं। 2014 में नोटा को 1.69% वोट मिले थे, और 2019 में यह आंकड़ा थोड़ा घटकर 1.36% पर आ गया, लेकिन फिर भी यह उन पार्टियों से कहीं बेहतर था, जिन्होंने अपना पत्ता भी नहीं कटवाया। अब सोचिए, जब किसी को नकारने का विकल्प दिया जाए और उसे नकारने वाला भी न हो, तो क्या इसे जीत मानना चाहिए?
तो क्या नेताओं को यह समझ में आ रहा है कि जनता का मूड अब बदल चुका है? नोटा ने तो यह दिखा दिया कि जब पार्टी या उम्मीदवार में दम नहीं, तो जनता अपनी नाकामी का हिसाब किताब नोटा से ही लेगी। क्या अब इन नेताओं को समझ में आएगा कि सिर्फ गाल बजाने से वोट नहीं मिलते, शायद अब जनता की चुप्पी से ही उनकी असलियत सामने आ जाएगी।



















