Jharkhand High Court का बड़ा फैसला: संवैधानिक अधिकारों के लिए कोर्ट जाने पर कर्मचारी को हटाना मनमाना

 झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत जाने पर कर्मचारी को सेवा से हटाना मनमाना और दुर्भावनापूर्ण है।


Jharkhand High Court  रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण लेने वाले कर्मचारी को केवल अदालत जाने के कारण सेवा से हटाना मनमाना और दुर्भावनापूर्ण माना जाएगा। ऐसा करना विधि के शासन की मूल भावना पर प्रहार है।

अदालत ने यह टिप्पणी धरो उरांव एवं अन्य की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायालय जाने का अधिकार स्वयं एक संवैधानिक अधिकार है और इस अधिकार का इस्तेमाल करने के कारण किसी नागरिक को प्रतिकूल परिणाम भुगतने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

Jharkhand High Court :कोर्ट जाने के कारण कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई उचित नहीं

जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने कहा कि राज्य या उसके अभिकरणों द्वारा न्यायिक उपचार लेने के कारण किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने की प्रथा समाप्त होनी चाहिए। अदालत ने माना कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता।


Key Highlights

  1. झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
  2. अदालत जाने के कारण कर्मचारी को सेवा से हटाना मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताया गया।
  3. कोर्ट ने कहा कि न्यायालय जाने का अधिकार स्वयं संवैधानिक अधिकार है।
  4. 10 वर्ष से अधिक समय तक स्वीकृत पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के मामले में फैसला आया।
  5. अदालत ने केवल संविदा या अस्थायी नियुक्ति के आधार पर सेवा को अनियमित मानने के तर्क को खारिज किया।

Jharkhand High Court: 10 साल से अधिक सेवा करने वाले कर्मचारियों के मामले में सुनवाई

पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता 10 वर्ष से अधिक समय तक स्वीकृत पदों पर काम करते रहे थे। राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति स्वीकृत पदों पर नहीं हुई थी। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम भारत संघ समेत अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी कर्मचारी द्वारा किया जा रहा कार्य लगातार जारी रहने वाला और संस्थान के लिए आवश्यक हो, तो केवल संविदा या अस्थायी नियुक्ति के आधार पर उसकी सेवा को अनियमित नहीं माना जा सकता।

Jharkhand High Court: विधि के शासन की रक्षा जरूरी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में न्यायिक उपचार के अधिकार को संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि किसी कर्मचारी को अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय जाने पर प्रतिकूल कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।

पीठ ने कहा कि न्यायालय की शरण लेने वाले व्यक्ति के खिलाफ केवल इसी वजह से कार्रवाई करना विधि के शासन की भावना के विपरीत होगा। मामले में अदालत की टिप्पणियां कर्मचारियों के न्यायिक उपचार के अधिकार और लंबे समय तक आवश्यक कार्य करने वाले अस्थायी या संविदा कर्मियों की सेवा से जुड़े विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।

 

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