झारखंड नगर निकाय Elections 2026 : दलीय नहीं फिर भी राजनीतिक, क्या शहरी चुनाव से खुलेंगी गठबंधन की गांठें?

झारखंड नगर निकाय चुनाव 2026 की घोषणा के बाद नामांकन से लेकर मतदान तक की तारीखें तय। दलीय नहीं फिर भी राजनीतिक दखल, गठबंधन और परिवारवाद पर बड़ा विश्लेषण।


 Elections 2026 : झारखंड में लंबे इंतजार के बाद नगर निकाय चुनाव की घोषणा हो चुकी है। चुनाव आयोग की अधिसूचना के साथ ही शहरी राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। भले ही यह चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से मैदान में उतर चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या यह चुनाव आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक राजनीतिक सेमीफाइनल साबित होगा।

 Elections 2026:नामांकन से मतगणना तक पूरा चुनावी कैलेंडर

चुनाव आयोग के मुताबिक 29 जनवरी से नामांकन की प्रक्रिया शुरू होगी, जो 4 फरवरी तक चलेगी। 5 फरवरी को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 6 फरवरी को नाम वापसी की अंतिम तिथि तय की गई है। 7 फरवरी को प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जाएंगे। मतदान 23 फरवरी को होगा, जबकि 27 फरवरी को मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे।
यह चुनाव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि रांची सहित कई बड़े नगर निगम लंबे समय से प्रशासकीय व्यवस्था के भरोसे चल रहे थे।

 Elections 2026:दलीय नहीं, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप पूरी तरह

कागजों में भले ही नगर निकाय चुनाव दलीय आधार पर न हों, लेकिन व्यवहार में राजनीतिक दल पूरी तरह सक्रिय हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों को उतारने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
पलामू में मेयर पद के लिए झामुमो द्वारा समर्थन की घोषणा ने यह साफ कर दिया है कि गठबंधन के भीतर भी समन्वय की कमी सामने आ सकती है। वहीं भाजपा शहरी क्षेत्रों में अपनी पारंपरिक पकड़ बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है। राजनीतिक जानकार इसे शहरी वोट बैंक का लिटमस टेस्ट मान रहे हैं।


Key Highlights

  • झारखंड में नगर निकाय चुनाव की घोषणा, 23 फरवरी को मतदान

  • दलीय नहीं होने के बावजूद सभी प्रमुख दल सक्रिय

  • ओबीसी आरक्षण पहली बार ट्रिपल टेस्ट के बाद लागू

  • गठबंधन दलों में समन्वय की कमी के संकेत

  • परिवारवाद शहरी चुनाव में भी बना अहम मुद्दा


 Elections 2026 :ओबीसी आरक्षण, कोर्ट और क्रेडिट की राजनीति

इस चुनाव की एक बड़ी विशेषता ओबीसी आरक्षण है, जो पहली बार ट्रिपल टेस्ट के बाद लागू किया गया है। इसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच क्रेडिट की होड़ भी दिखी।
सरकार का तर्क है कि उसने संवैधानिक प्रक्रिया पूरी कर आरक्षण लागू किया, जबकि विपक्ष इसे न्यायिक दबाव और जनहित याचिकाओं का नतीजा बता रहा है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों की राय में ओबीसी आरक्षण अब एक साझा उपलब्धि बन चुका है, जिसे कोई एक दल पूरी तरह अपने नाम नहीं कर सकता।

 Elections 2026 :परिवारवाद भी रहेगा बड़ा मुद्दा

नगर निकाय चुनाव में परिवारवाद का मुद्दा भी खुलकर सामने आ रहा है। रांची, धनबाद और पलामू जैसे बड़े शहरों में सांसदों, विधायकों और पूर्व जनप्रतिनिधियों के करीबी रिश्तेदार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं।
पत्नी, पुत्र या पुत्री को मेयर, डिप्टी मेयर या वार्ड पार्षद बनाने की कोशिशें यह दिखाती हैं कि शहरी स्थानीय निकाय भी अब बड़े राजनीतिक दांव-पेच का केंद्र बन चुके हैं।

 Elections 2026 :शहरी राजनीति का सेमीफाइनल

राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह चुनाव भाजपा के लिए शहरी आधार बचाने की लड़ाई है, जबकि झामुमो के लिए यह साबित करने का मौका कि वह गांवों के साथ-साथ शहरों में भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव गठबंधन में अपनी उपयोगिता और प्रभाव दिखाने का अवसर माना जा रहा है।
27 फरवरी को आने वाले नतीजे यह संकेत दे सकते हैं कि 2029 से पहले झारखंड की शहरी राजनीति किस दिशा में बढ़ेगी।

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