
रांची: झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक वाद्ययंत्र ‘मांदर’ को जल्द ही जीआई (भौगोलिक संकेतक) टैग मिलने की संभावना है। यह झारखंड के लिए एक बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि होगी। 20 दिसंबर को दिल्ली में इस संदर्भ में एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें मांदर के विशेषज्ञ नंदलाल नायक भी शामिल होने वाले थे, लेकिन वे उपस्थित नहीं हो सके।
इस बैठक में गुमला जिले के कई मांदर कलाकार झारखंड से दिल्ली पहुंचे। हालांकि, फिलहाल जीआई टैग देने को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन उम्मीद है कि आगामी दिनों में विभाग इस पर सकारात्मक घोषणा करेगा।
नंदलाल नायक ने कहा कि मांदर बजाने वाले कलाकारों को इस निर्णय से नई उम्मीदें बंधी हैं। इससे पहले झारखंड के हजारीबाग की सोहराय पेंटिंग को जीआई टैग मिल चुका है। गुमला जिला प्रशासन पिछले एक वर्ष से मांदर को जीआई टैग दिलाने के लिए प्रयासरत है।
झारखंड में ही बनता है मांदर
विशेषज्ञ नंदलाल नायक के अनुसार, मांदर एक विशिष्ट वाद्ययंत्र है जो केवल झारखंड में बनाया जाता है। इसे बनाने की विशेषज्ञता मुख्य रूप से दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र के घासी समुदाय के पास है। गुमला जिले के रायडीह प्रखंड में करीब 22 परिवार छह पीढ़ियों से मांदर निर्माण में लगे हैं।
जीआई टैग मिलने से इन कलाकारों और निर्माताओं को नई पहचान और समुचित बाजार मिलेगा, जिससे उनकी आजीविका में सुधार होगा।
झारखंड के अन्य उत्पाद जिन्हें मिला GI टैग
इससे पहले हजारीबाग की सोहराय पेंटिंग को जीआई टैग मिल चुका है, जिससे इसे देश और दुनिया में पहचान मिली। कोडरमा के कलाकंद और देवघर के पेड़े को भी दो साल पहले जीआई टैग के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
क्या है GI टैग?
जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेतक किसी क्षेत्रीय उत्पाद की विशिष्टता और उसकी गुणवत्ता का प्रमाण होता है। यह टैग उत्पाद को वैश्विक मान्यता प्रदान करता है और उसके मूल स्थान की पहचान को संरक्षित करता है।
झारखंड का मांदर, अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता के साथ, जीआई टैग मिलने पर न केवल राज्य की पहचान को मजबूत करेगा बल्कि इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति भी दिलाएगा।
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