दिल्ली से लौट आए नीतीश: बड़ी चुनौतियां हैं विपक्षी एकता की राह में

पटना : नितीश का दिल्ली दौरा -आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के

बाद नीतीश कुमार पहली बार दिल्ली गए और अब वहां से वापस लौट आए हैं.

उनके वापस बिहार आते ही ये चर्चा होने लगी है कि दिल्ली के दौरे से

क्या नीतीश कुमार वह सब हासिल कर सके जिसकी अपेक्षा के साथ उन्होंने दिल्ली कूच किया था.

विपक्षी दलों से एकजुट होने का आह्वान

बिहार में सहयोगी बदलने के बाद नई सरकार के गठन के साथ ही नीतीश ने अपने पुराने और

सबसे ज्यादा समय तक सहयोगी रहने वाले भाजपा के खिलाफ, विपक्षी दलों से एकजुट होने का आह्वान किया.

और इसी इरादे को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य के साथ वह दिल्ली गए.

नीतीश का दिल्ली दौरा – कई दिग्गज नेताओं से की मुलाकात

दिल्ली में उन्होंने राहुल गांधी से लेकर सीताराम येचुरी, ओम प्रकाश चौटाला, अरविंद केजरीवाल,

अखिलेश यादव और शरद पवार तक बीजेपी का विरोध करने वाले कई नेताओं से मुलाकात की.

यहां यह कहना सही होगा कि दिल्ली में उन्होंने बार-बार यह कहा कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं.

वह सिर्फ भाजपा के खिलाफ सारे विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं.

नीतीश ने क्यों कही वह नहीं है पीएम पद के दावेदार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह बातें इसलिए बार-बार कहीं क्योंकि उन्हें अच्छे से पता है कि

विपक्ष के कई नेता हैं जिनके मन में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की अभिलाषा है.

नीतीश यह जानते थे कि अगर उन्होंने खुद को अगुआ बताने या दिखाने तक की भी कोशिश की तो

कई नेता उनसे दूरी बना लेंगे. इसलिए उन्होंने बारंबार ज़ोर देकर कहा कि वो अगुआ नही हैं.

वो सिर्फ विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश भर कर रहे हैं.

विपक्षी एकता कांग्रेस और लेफ्ट के बिना संभव नहीं

जदयू की ओर से जो बातें अब तक सामने आई है उसके अनुसार उनका मानना है कि

विपक्षी एकता बिना कांग्रेस और बिना लेफ्ट के संभव नहीं. यहीं नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

विपक्ष में बहुत सारी पार्टियां ऐसी हैं जो भाजपा से तो दूरी चाहती ही है पर

वह कांग्रेस के नजदीक भी नहीं दिखना चाहती.

नीतीश का दिल्ली दौरा – विपक्ष में हैं कई पीएम पद के दावेदार

तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर को अपने राज्य में कांग्रेस के खिलाफ भी लड़ाई लड़नी होती है. वहां भाजपा भी अब मजबूत हो गई है. यही वजह है कि वह भाजपा और कांग्रेस दोनों के बिना विपक्षी एकता की बात करते हैं. इसी तरह ममता बनर्जी भी उन्हें (ममता बनर्जी को) विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किए बिना चुनाव पूर्व शायद ही कांग्रेस के नजदीक दिखना चाहे. इसकी बानगी उपराष्ट्रपति चुनाव के समय दिखी जब उन्होंने खुद को विपक्ष से अलग कर लिया था.

भाजपा को चुनौती दे सकती है आप !

रही बात अरविंद केजरीवाल की तो वह खुद को कट्टर भाजपा विरोधी दिखाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं. आम आदमी पार्टी को लगता है की अगर वह भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों से चुनाव पूर्व दूर रहे तो वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को चुनौती दे सकती है. इसीलिए आम आदमी पार्टी बार-बार यह कहती है कि वह एकमात्र ऐसी विपक्षी पार्टी है जिसके एक से अधिक राज्य में सरकारें है. अपने कट्टर भाजपा विरोधी छवि को मज़बूत करने के लिए आम आदमी पार्टी भाजपा के गढ़ गुजरात में ज्यादा आक्रामक नजर आ रही है. दिल्ली में भी भाजपा के खि़लाफ़ ‘आप’ हमलावर है. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद का सबसे बड़ा दावेदार बताने में तनिक भी नहीं हिचकते.

देवीलाल की जयंती से ‘आप’ ने अपने आप को रखा दूर, कांग्रेस को बुलावा नहीं

देवीलाल की जयंती पर हरियाणा में होने वाले बड़े आयोजन में विपक्ष के बड़े चेहरे शामिल होंगे. वहां भी उस आयोजन में शामिल नहीं होकर ‘आप’ यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि वो बाकियों से अलग है और उसे ख़ुद पर विश्वास हैं. दूसरी तरफ़ इस आयोजन से कांग्रेस को दूर रखा गया है. जबकि इस बड़े आयोजन में नीतीश, तेजस्वी अखिलेश और ममता जैसे बड़े लीडर्स शिरकत करेंगे.

नीतीश का दिल्ली दौरा – नीतीश कुमार के सामने है कई बड़ी चुनौती

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यही बड़ी चुनौती है कि वह भाजपा और कांग्रेस दोनों से दूरी बनाए रखने की हिमायत करने वाली पार्टियों को कांग्रेस के साथ एक मंच पर कैसे लेकर आएं? और दूसरी उससे भी बड़ी चुनौती ये कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की महत्वाकांक्षा पाले बैठे अलग-अलग दलों के नेताओं को सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को हराने के नाम पर एक फ्रंट में कैसे लाएं? उनके बीच आपस में विश्वास पैदा करना शायद नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

विश्लेषण- राकेश रंजन कटरियार

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