पटना : कभी पारंपरिक खेती के लिए पहचाने जाने वाले बिहार में अब खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है। यहां के किस वैज्ञानिक और शोधकर्ता मिलकर ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जो न सिर्फ कृषि की दिशा बदल रहे हैं बल्कि किसानों की आमदनी में भी इजाफा कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अब बिहार में ड्रैगन फ्रूट के साथ-साथ रबड़ की खेती भी संभव होती दिख रही है जो पहले दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर राज्यों तक सीमित मानी जाती थी।
पायलट से प्रॉफिट तक, बिहार में हाई-वैल्यू खेती की शुरुआत
मुंगेर, कटिहार जैसे कई जिले इस बदलाव की नई कहानी लिख रहे हैं। मुंगेर विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग से रिसर्च कर रहे बबलू कुमार ने इस दिशा में पहल करते हुए केरल के किसानों और वैज्ञानिकों से संवाद स्थापित किया। उनके प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि पहले पायलट प्रोजेक्ट के तहत बीआरएम कॉलेज परिसर में लगभग एक कट्ठा जमीन पर रबड़ के पौधे लगाए गए और महज पांच महीने में ही पौधों की वृद्धि संतोषजनक रही। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि बिहार की जलवायु भी रबड़ की खेती के लिए अनुकूल हो सकती है। यदि यह प्रयोग सफल होता है तो यह राज्य के किसानों के लिए एक नया विकल्प बन सकता है। इस पहल को आगे बढ़ते हुए अगले मानसून में खगड़िया जिला के परबत्ता क्षेत्र में करीब दो एकड़ भूमि पर रबड़ की खेती का विस्तार करने की योजना है। जिससे आने वाले दिनों में बिहार के किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ व्यवसायिक खेती में अपनी अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं।

रबड़ की कौन सी प्रजाति बिहार के जलवायु के अनुकूल
बीआरएम कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के शिक्षक एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप टाटा बताते हैं कि फिलहाल परिसर में रबड़ का हेबिया ब्राजीलिएंसेस का पौधा लगाया गया है। जिसके बीज मेघालय से मंगवाए गए हैं। रबड़ की यह उष्णकटिबंधीय प्रजाति सामान्यत: 30 से 40 मीटर तक ऊंचा होता है और लगभग सात वर्ष की आयु से लेकर 30 वर्ष तक रबड़ उत्पादन देता है। इस परियोजना के अंतर्गत पारंपरिक रबड़ स्रोतों के साथ-साथ वैकल्पिक रबड़ उत्पादक पौधों जैसे रशियन डंडेलियन और गुआयुले पर भी प्रयोग किए जा रहे हैं। इन प्रजातियों को बिहार की लगभग चार महीने की ठंड को रशियन डंडेलियन के लिए अनुकूल माना जा रहा है, जो लगभग छह महीने में तैयार हो जाता है। इस दिशा में विश्वविद्यालय ने हिमालयन वन शोध संस्थान (HFRI), शिमला और रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (RRII) के साथ त्रिपक्षीय समझौता (MoU) किया है।

YouTube से सीखी खेती, अब बन गए लाखों के किसान
वहीं दूसरी ओर आधुनिक खेती की लहर का असर अब गांव-गांव में दिखने लगा है। कटिहार जिला के कोढ़ा प्रखंड अंतर्गत भटवाड़ा पंचायत के रहने वाले प्रगतिशील किसान अजीत कुमार मंडल के अपने खेतों में आधुनिक खेती का मॉडल पेश कर अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुके हैं। इजरायली पद्धति से ड्रैगन-फ्रुट की खेती कर रहे अजीत ने यह साबित कर दिया है कि सही तकनीक और जानकारी से खेती को सालों भर लाभदायक बनाया जा सकता है। जहां सामान्यत: बिहार में ड्रैगन फ्रूट की खेती केवल छह महीने तक सीमित रहती है, वही अजीत के खेतों में उत्पादन लगभग पूरे साल जारी रहता है।

पहले वह केले की खेती करते थे लेकिन फसल में हुए नुकसान ने उन्हें आर्थिक संकट में डाल दिया
पहले वह केले की खेती करते थे लेकिन फसल में हुए नुकसान ने उन्हें आर्थिक संकट में डाल दिया। लेकिन उन्होंने हार नहीं और समाधान की तलाश में उन्होंने इंटरनेट व यूट्यूब का सहारा लेकर उच्च बाजार मूल्य वाली फसलों की खोज शुरू की। यही से इनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। उन्होंने वियतनाम ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की और इजरायली तकनीक अपनाकर उसे और उन्नत बनाया।

6 महीने नहीं, पूरे साल फल, बिहार में ड्रैगन फ्रूट का कमाल
शुरुआत में करीब सात लाख रुपए का निवेश करने वाले अजीत आज लाखों रुपए का मुनाफा कमा रहे हैं। खास बात यह है कि उनका यह निवेश आने वाले लगभग 20 वर्षों तक स्थायी आय का आधार बन चुका है। आज उनके खेत उत्पादन का केंद्र बनने के साथ-साथ सीखने का केंद्र भी बन गया है। किसान यहां आकर आधुनिक खेती की तकनीक समझ रहे हैं। और उनसे प्रेरित होकर ड्रैगन फ्रूट जैसे व्यवसायिक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

बिहार की खेती अब बदलाव के दौर से गुजर रही है
बिहार की खेती अब बदलाव के दौर से गुजर रही है। बिहार सरकार आधुनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए उद्दान निदेशालय के द्वारा ड्रैगन फ्रूट विकास योजना के तहत ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए अनुदान प्रदान कर रही है। प्रदेश सरकार ड्रैगन फ्रूट का क्षेत्र विस्तार राज्य के 23 जिलों अररिया, औरंगाबाद, बेगुसराय, भागलपुर, भोजपुर, बक्सर, दरभंगा, गया, जमुई, कैमूर, कटिहार, किशनगंज, लखीसराय, मधेपुरा, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, नवादा, पूर्णियां, रोहतास, समस्तीपुर, सारण, शेखपुरा एवं सीवान में कर रही है। साथ ही कृषि से जुड़ी नवाचारों व नए तकनीकों को भी बढ़ावा दे रही है। जहां एक ओर वैज्ञानिक प्रयोग नई संभावनाएं खोल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अजीत मंडल जैसे किसान इन संभावनाओं को जमीन पर उतारकर सफलता की नई कहानी लिख रहे हैं।
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