नामांकन के खेल में ‘सेटबाजी’: कहीं फाइल कटी, कहीं किस्मत बची!

बिहार चुनाव में कई प्रत्याशियों के नामांकन रद्द, लेकिन जिनके पास दो या तीन सेट थे, उनकी किस्मत खुल गई। पढ़िए इस राजनीतिक व्यंग्य में पूरी सेटबाजी की कहानी।


राजनीतिक गलियारों में गूंजा नया जुमला  “सेट ज़्यादा, सेटिंग पक्की!”

नामांकन के खेल में ‘सेटबाजी’ पटना: बिहार का चुनावी रण केवल नारों और पोस्टरों से नहीं सजता, बल्कि फॉर्म के सेटों से भी चलता है। इस बार तो नामांकन प्रक्रिया ने ऐसा रंग दिखाया कि लगता है, “एक सेट भरा तो फंसे, दो सेट भरे तो बचे।”

राज्य की 39 विधानसभा सीटों पर कई बड़े दलों के उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों में कैंची चली है — वो भी एक नहीं, दो-दो, तीन-तीन सेटों पर। पर कहते हैं न, “राजनीति में बैकअप रखना ज़रूरी है, चाहे वो गठबंधन का हो या नामांकन का।”


Key Highlights:

  • 39 सीटों पर कई प्रत्याशियों के नामांकन रद्द

  • राजद के दो उम्मीदवार मैदान से बाहर

  • भाजपा-जदयू के कई प्रत्याशी दूसरे सेट से बचे

  • कांग्रेस प्रत्याशी के तीन नामांकन रिजेक्ट

  • लेफ्ट पार्टियों के सात क्षेत्रों में गड़बड़ी


नामांकन के खेल में ‘सेटबाजी’: कहां-कहां लगा झटका, कहां-कहां बची इज़्ज़त

  • राजद (RJD) के नौ उम्मीदवारों को पसीना छूट गया, दो बाहर भी हो गये – मोहनिया और सुगौली में नामांकन रद्द होने से मैदान से बाहर!

  • जदयू (JDU) की किस्मत ने साथ दिया – अमौर, अररिया, बरौली, बिहारीगंज में “सेटबाज़ी” काम आ गई।

  • भाजपा (BJP) ने बैकुंठपुर से लेकर वारसलीगंज तक राहत की सांस ली, वरना “कमल” खिलने से पहले ही कुम्हला जाता।

  • कांग्रेस (INC) बछवाड़ा में फंस गई – तीन नामांकन पत्र रद्द, जैसे “तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा!”

  • लेफ्ट पार्टियां (CPI-ML, CPI) भी पीछे नहीं रहीं — भोरे, दरौली और काराकाट में कागज़ों की काट-छांट से लाल रंग थोड़ा फीका पड़ा।

नामांकन के खेल में ‘सेटबाजी’:

अब चुनावी दफ्तरों में अफसर कह रहे हैं  “कौन कहता है फॉर्म भरना आसान है? यहां तो फॉर्म भी राजनीति सीख गया है!”
एक राजद कार्यकर्ता बोला, “हमने सोचा था दो सेट भरेंगे तो एक रिजर्व रहेगा, पर अब लग रहा है तीसरा सेट भी रखना चाहिए था… जैसे सरकारों का बैकअप रखते हैं।”

भाजपा खेमे में भी राहत की सांस — “नामांकन रद्द होता तो उम्मीदवार नहीं, पूरा प्लान ग़ायब हो जाता। अब तो अगला स्लोगन यही होगा  ‘हर घर सेट, हर सीट सेट!’”

इस बार के नामांकन में सबसे बड़ा सबक यह रहा कि “सेट ज़्यादा, तो सैटिंग मज़बूत।”
राजनीति में अब सिर्फ सीटों की नहीं, सेटों की गिनती भी उतनी ही अहम है।
कहीं एक फॉर्म ने उम्मीदवारी छीनी, तो कहीं दूसरा फॉर्म बना ‘संकटमोचक’।



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