NTPC के पहल से बदली बिरहोर टोला की किस्मत, खनन परियोजना के सीएसआर फंड से किया गया जीर्णोद्धार

Hazaribagh: हजारीबाग जिले के चूरचू प्रखंड अंतर्गत नगड़ी गांव में स्थित नगरी बिरहोर तोले का NTPC पकरी बरवाडीह कोल खनन परियोजना के द्वारा जीर्णोद्धार किया गया है। सीएसआर फंड से किए गए इस जीर्णीधार कार्य के कारण बिरहोर टोले की किस्मत बदल गई है।

जहां पहले टूटे-फूटे मकान में रहने को विवश बिरहोर जनजाति के 18 परिवारों को अब पक्के मकान मिले हैं तो वही पूरे बिरहोर टोले में बिजली की भी समुचित व्यवस्था की गई है एवं मार्क्स लाइट भी लगाया गया है ताकि जो क्षेत्र हाथियों का गलियारा है और जंगली जानवर भी वहां आते रहते हैं उनसे पूरे बिरहोर टोल के लोगों को सुरक्षा मुहैया हो सके।

बिरहोर बच्चों की पढ़ने की भी व्यवस्था की गई

जीर्णोद्धार कार्यक्रम के तहत वहां पर बिरहोर बच्चों की पढ़ने की भी व्यवस्था की गई है और एक आदि सेवा केंद्र भी बनाया गया है जो वही का एक बिरहोर शिक्षित युवा रोहित के द्वारा इसे चलाया जाता है रोहित खुद शिक्षित है और अब एनटीपीसी के मदद से मिले इस आदि सेवा केंद्र में 15 से 16 बिरहोर बच्चों को शिक्षा देने का काम भी कर रहा है ।

रोहित यह भी बताता है कि किस प्रकार से इस जीर्णोद्धार कार्य के बाद पूरे बिरहोर टोल के लोगों की जीवन शैली में बदलाव आया है । वही नगडी बिरहोर तोले की अन्य महिलाएं भी बताती हैं कि किस प्रकार से एनटीपीसी पकरी बरवाडीह के इस कार्य से उनके जीवन शैली में सुधार आया है और अब वह अच्छे से जीवन यापन कर रहे हैं एवं भविष्य में बच्चों को पढ़ा भी सकेंगे।

NTPC पकरी बरवाडीह ने जनजाति बचाने के लिए प्रयास किया

बता दें कि बिरहोर झारखंड में संरक्षित जनजातियों में से एक है एवं विलुप्त हो रहे इन जनजातियों को बचाने के लिए कई तरह की सरकारी कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं तो वहीं NTPC पकरी बरवाडीह ने भी अपने CSR फंड से संरक्षित जनजाति को बचाने का प्रयास किया है ।

NTPC पकरी बरवाडीह कोल खनन परियोजना CSR के सीनियर मैनेजर कमला राम रजक ने भी 22SCOPE से बातचीत करते हुए बताया कि एनटीपीसी पकरी बरवाडीह कोल खनन परियोजना के परियोजना प्रमुख एक बार यहां घूमने पहुंचे थे और उनकी स्थिति को देखकर उन्होंने तुरंत उनकी स्थिति को सुधारने का दिशा निर्देश दिया था। एक महीने के युद्ध स्तर के काम के बाद यहां पर उनके लिए इस प्रकार के घर बनाए गए हैं और भविष्य में कई अन्य योजनाएं भी है जो यहां पर NTPC अपने CSR फंड से करेगी।

पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: बिरहोर (Birhor) शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
बिरहोर मुंडारी भाषा के दो शब्दों से बना है— 'बिर' का अर्थ है 'जंगल' और 'होर' का अर्थ है 'आदमी'। इसका पूर्ण अर्थ 'जंगल का आदमी' या 'वनवासी' होता है।
Q: बिरहोर जनजाति के दो मुख्य सामाजिक वर्ग कौन से हैं?
बिरहोर जनजाति दो वर्गों में विभाजित है: 1. उथलु (घुमंतू प्रवृत्ति के जो शिकार के लिए भटकते हैं) और 2. जधीस या जाघी (जो एक स्थान पर स्थायी झोपड़ी बनाकर रहते हैं)।
Q: बिरहोर जनजाति में 'कुड़िया' और 'टांडा' किसे कहते हैं?
बिरहोरों की पत्तों और टहनियों से बनी झोपड़ी को 'कुड़िया' (या कुंभा) कहा जाता है, जबकि इनकी छोटी बस्ती या समूह को 'टांडा' कहा जाता है।
Q: बिरहोर जनजाति का सर्वोच्च देवता कौन है?
सिंगबोंगा (सूर्य देव) बिरहोर जनजाति के सबसे बड़े और प्रमुख देवता माने जाते हैं। वे मुख्य रूप से सूरजदेव की ही आराधना करते हैं।
Q: बिरहोर समाज में 'मालिक' और 'ढेड़हा' का क्या कार्य है?
बिरहोर जनजाति में मुखिया को 'मालिक' कहा जाता है, जबकि धार्मिक अनुष्ठान और पूजा संपन्न करने वाले पंडित या पुजारी को 'ढेड़हा' (या नाया) कहा जाता है।
Q: बिरहोर जनजाति के युवागृह को किस नाम से जाना जाता है?
इस जनजाति के युवागृह को 'गीतिआना' या 'गीतिओरा' कहा जाता है, जहाँ युवाओं को जनजातीय परंपराओं की शिक्षा दी जाती है।
Q: बिरहोरों की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार क्या है?
ये मुख्य रूप से वनों पर निर्भर हैं। कृषि के साथ-साथ ये बांस और मोहलाईन (नार वाले पौधे) की छाल से रस्सी एवं टोकरियाँ बनाकर बाजारों में बेचते हैं।
Q: प्रसिद्ध पुस्तक 'The Birhor' के लेखक कौन हैं और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
इस पुस्तक के लेखक सुप्रसिद्ध मानवविज्ञानी एस. सी. रॉय (S.C. Roy) हैं। 1925 में प्रकाशित यह पुस्तक बिरहोर जनजाति के जीवन और संस्कृति पर आधारित सबसे प्रामाणिक शोध मानी जाती है।
Q: क्या बिरहोर जनजाति PVTG श्रेणी में आती है?
हाँ, बिरहोर जनजाति भारत सरकार द्वारा घोषित 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों' (Particularly Vulnerable Tribal Groups - PVTG) के अंतर्गत आती है।
Q: बिरहोर जनजाति मुख्य रूप से किन राज्यों में पाई जाती है?
बिरहोर जनजाति मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के जंगली क्षेत्रों में निवास करती है।
Q: बिरहोर जनजाति की भाषा 'बिरहोरी' का संबंध किस भाषा परिवार से है?
बिरहोरी भाषा 'ऑस्ट्रो-एशियाई' (Austro-Asiatic) भाषा परिवार के मुंडा समूह से संबंधित है। यह संथाली और मुंडारी भाषाओं के काफी करीब मानी जाती है।
Q: बिरहोर समाज में 'कन्या शुल्क' (Bride Price) की क्या परंपरा है?
बिरहोरों में विवाह के समय वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को 'कन्या शुल्क' देना अनिवार्य है, जिसे स्थानीय भाषा में 'पोम' या 'दूरी' कहा जाता है। इसके बिना विवाह संपन्न नहीं माना जाता।
Q: बिरहोरों के 'कुंभा' (झोपड़ी) के दरवाज़े इतने छोटे क्यों होते हैं?
यह उनके सुरक्षा कौशल का हिस्सा है। छोटे दरवाज़े जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं और सर्दियों में झोपड़ी के भीतर के तापमान को गर्म बनाए रखने में मदद करते हैं।
Q: बिरहोर जनजाति में 'बापला' शब्द का क्या अर्थ है?
बिरहोर अपनी भाषा में विवाह को 'बापला' कहते हैं। इनमें सदर बापला (व्यवस्थित विवाह) और उधरा-उधरी बापला (पलायन विवाह) जैसे कई प्रकार प्रचलित हैं।
Q: बिरहोरों का 'बंदर के शिकार' (Monkey Hunting) से क्या सांस्कृतिक संबंध है?
पारंपरिक रूप से बिरहोरों को बंदर पकड़ने में माहिर माना जाता है। उनके लिए यह केवल भोजन का साधन नहीं, बल्कि उनके साहस और सामुदायिक एकता का प्रतीक है, जिसे 'हनुमान शिकार' भी कहा जाता है।
Q: बिरहोर जनजाति में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की क्या प्रथा है?
बिरहोरों में शव को दफनाने और जलाने दोनों की प्रथाएं हैं। आमतौर पर सामान्य मृत्यु होने पर दफनाया जाता है और विशेष परिस्थितियों में दाह संस्कार किया जाता है।
Q: बिरहोर जनजाति के लोग 'मोहलाईन' बेल का उपयोग किस प्रकार करते हैं?
वे मोहलाईन (Bauhinia vahlii) की छाल से बेहद मजबूत रस्सियाँ बनाते हैं। इसके पत्तों का उपयोग 'कुंभा' बनाने और दोना-पत्तल बनाने के लिए भी किया जाता है।
Q: बिरहोर समाज में महिलाओं की स्थिति कैसी है?
बिरहोर महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में पुरुषों के बराबर सक्रिय रहती हैं। वे कंद-मूल इकट्ठा करने, टोकरी बनाने और रस्सियाँ बुनने में निपुण होती हैं और परिवार के निर्णयों में उनकी राय महत्वपूर्ण होती है।
Q: भारत सरकार बिरहोरों के संरक्षण के लिए कौन सी विशेष योजना चला रही है?
चूंकि वे PVTG में शामिल हैं, इसलिए सरकार 'पीएम-जनमन' (PM-JANMAN) योजना के तहत उनके आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के लिए विशेष बजट आवंटित कर रही है।
Q: बिरहोरों के उत्सवों में नाच-गान का क्या महत्व है?
बिरहोरों के मुख्य नृत्य 'डोंग' और 'लागरे' हैं। वे मांदर और नगाड़े की थाप पर अपनी खुशियों और धार्मिक अवसरों का उत्सव मनाते हैं, जो उनकी सामुदायिक भावना को मजबूत करता है।
Saffrn

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