Loksabha Election 2024: बंगाल की सियासत में भोजपुरी भाषियों के कद्दावर चेहरा अर्जुन सिंह की इस बार कड़ी परीक्षा

कोलकाता : Loksabha Election 2024 में बंगाल की सियासत की देखें तो मिलता है कि राज्य के 42 लोकसभा सीटों में से चुनिंदा हॉट सीटों में कोलकाता से सटे जूटमिलों की बहुलता वाले बैरकपुर संसदीय सीट शामिल है। यहां से भाजपा के टिकट पर लगातार दूसरी बार चुनावी मैदान में हैं लेकिन उनकी सियासत के बारे में यह बात पढ़ने या सुनने में जितना सहज लगता है, उतनी है नहीं। बंगाल की सियासत में भोजपुरी या विहंगम तौर पर हिंदी भाषियों के बीच भरोसेमंद कद्दावर चेहरे के रूप में स्थापित होने के संघर्ष की गाथा रोचक होने के साथ जरा लंबी भी है। राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस उन्हें हर हाल में शिकस्त देने में जुटी है तो अर्जुन ने भी अपनी आंखें उसी लक्ष्य पर प्रतिपक्षियों के लिए टिका रखी है। टक्कर कांटे का है और तत्काल नतीजों संबंधी भविष्यवाणी को लेकर बंगाली सियासत के जानकार भी कुछ नहीं बुदबुदाना चाहते।

वर्ष 2001 से 2016 तक अर्जुन सिंह अपने हिंदी और भोजपुरी बेल्ट वाले भाटपाड़ा से तृणमूल का परचम फहराया।
फाइल फोटो

अर्जुन के पिता कांग्रेस से 3 बार विधायक रहे

अर्जुन सिंह के पिता सत्यनारायण सिंह भी सियासत में रहे और कांग्रेस की टिकट पर तीन बार विधायक चुने गए थे। बैरकपुर संसदीय क्षेत्र ही नहीं बल्कि कोलकाता से सटे उत्तर 24 परगना में सत्यनारायण सिंह हिंदीभाषियों के लिए भरोसेमंद राजनेता के रूप में उभरे। भाटपाड़ा विधानसभा इनका पुराने कार्यक्षेत्र रहा लेकिन राजनीतिक रसूख और दबदबा पूरे उत्तर 24 परगना में यहीं के बूते कायम रहा। यही सियासी थाती अर्जुन के लिए मजबूत आधार बनी।

ममता के भरोसेमंद भोजपुरी युवा नेता रहे, 4 बार लगातार बने विधायक

अर्जुन सिंह ने अपनी सियासी पारी भाटपाड़ा नगरपालिका से की। वह चेयरमैन भी बने और तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के ऐसे विश्वस्त उभरते हिंदी भाषी युवा नेता के रूप में पहचान बनाई जिसे तृणमूल ने चार बार विधानसभा चुनाव में मौका दिया। चारों बार वर्ष 2001 से 2016 तक अर्जुन सिंह अपने हिंदी और भोजपुरी बेल्ट वाले भाटपाड़ा से तृणमूल का परचम फहराया।

अर्जुन सिंह ने ममता बनर्जी को निऱाश भी नहीं किया और विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर हिंदी जुबान वाले नेता के रूप में उभरे जिसने बंगीय राजनीति में स्व. देवकीनंदन पोद्दार, राजेश खेतान, स्व. अनय गोपाल सिन्हा, राजदेव ग्वाला, रामप्यारे राम, स्व. कलीमुद्दीन शम्स जैसी छवि बनानी शुरू की जो आम हिंदी भाषी या भोजपुरिया जुबान वालों की आवाज के रूप में देखा जाने लगा।

इस क्रम में पूरे बंगाली सियासत में देखें तो अर्जुन सिंह ने अपनी वह छवि बनाई जो तृणमूल में शामिल होकर भी हृदयानंद गुप्ता भी हासिल नहीं कर पाए जिनके एक शागिर्द स्व. अमर सिंह देश की सियासत का अहम चेहरा बने जबकि दूसरे विजय उपाध्याय तृणमूल से पार्षद हैं और संतोष पाठक कांग्रेस में कद्दावर हिंदी भाषी चेहरा हैं।

अर्जुन सिंह ने ममता बनर्जी को निऱाश भी नहीं किया और विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर हिंदी जुबान वाले नेता के रूप में उभरे
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भाजपा से तृणमूल में लौटे लेकिन टिकट कटते ही भगवा ब्रिगेड में की वापसी

इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी मानी जाती है कि अर्जुन हिंदी पट्टी के भोजपुरी भाषियों का मूड भांपकर सियासी चोला उतारने या ओढ़ने के साथ बोलने या संघर्ष करने में कोई गुरेज नहीं करते। वर्ष 2014 में केंद्र में पीएम मोदी की सरकार बनने के बाद से बंगाल में बदलाव की बात होने लगी थी।

उस समय भी भोजपुरी भाषियों का मूड भांपकर अर्जुन ने तृणमूल कांग्रेस को छोड़ने में समय नहीं लगाया और भाजपा में शामिल होकर महज 28 दिनों की चुनावी तैयारी में वर्ष 2019 में लोकसभा पहुंचे।

उनकी इसी सोच को उनके बेटे पवन ने भी अपनाया और भाजपा में ऐसे जुड़े कि भाटपाड़ा से विधायक भी निर्वाचित हुए और अब भी हैं।

पश्चिम बंगाल जिस राजनीतिक हिंसा और प्रतिशोध के लिए बदनाम है, उसका शिकार अर्जुन सिंह भी तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के बाद हुए। कई हमले हुए और अर्जुन सिंह के चुनिंदा भरोसेमंद करीबी मारे गए। इन्हें आर्थिक नुकसान भी होना शुरू हुआ तो मजबूरी में इन्हें अपना हिंदी दैनिक भी बंद करना पड़ा। नतीजा यह कि वर्ष 2022 में अर्जुन सिंह ने भाजपा को नमस्ते कर दिया और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए।

दोबारा तृणमूल में वापसी के बाद अर्जुन को संगठन में खोया हुआ रुतबा मिलने की आस बंधी लेकिन परिवार में बेटे से बोलचाल तक बंद हो गई जो भाजपा में ही विधायक बने रहे। उम्र के 62वें वर्ष में परिवार में यह खटपट अर्जुन सिंह को खूब अनमना कर दे रही थी लेकिन तभी टिकट बंटवारे के दौरान तृणमूल कांग्रेस ने इन्हें लोकसभा चुनाव में किनारे किया तो इन्होंने वापस भाजपा जुड़ने की पहल की।

भाजपा ने बंगीय सियासत में बड़ी हिस्सेदारी वाली हिंदी और भोजपुरी बेल्ट में इस शख्सियत की अहमियत को समझा और तुरंत न केवल भाजपा में ज्वाइनिंग हुई बल्कि पुराने निर्वाचन क्षेत्र बैरकपुर से चुनाव मैदान में भी उतार दिया। इसके बाद अर्जुन के परिवार में बीते कुछ समय से चली रही चुप्पी और अनबन भी अनकहे ही मिट गई और सभी मिलकर चुनावी मैदान में जुट गए हैं।

अर्जुन सिंह ने अपनी वह छवि बनाई जो तृणमूल में शामिल होकर भी हृदयानंद गुप्ता भी हासिल नहीं कर पाए जिनके एक शागिर्द स्व. अमर सिंह देश की सियासत का अहम चेहरा बने ज
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भोजपुरी बेल्ट और बिहार की सियासत पर लड़ाते हैं गप्पें

बैरकपुर संसदीय सीट जूट मिल बेल्ट वाला भी कहा जाता है। इसकी नब्ज पकड़ने को इन मिलों से जुड़े 80 फीसदी भोजपुरी या हिंदी भाषी वर्करों के मिजाज को भांपने और उसमें खुद को ढालने में अर्जुन सिंह को कोई खास परेशानी इसलिए नहीं होती क्योंकि वह खुद बिहार के भोजपुर के आरा के हैं। गाहे-बगाहे वह बंगाल से ज्यादा बिहार और पूर्वी यूपी यानी पूर्वांचल की सियासत पर बड़े चाव से गप्पे लड़ाते देखे जाते हैं। भाजपा से तृणमूल में वापसी करने के बाद भी वह गत वर्ष 2023 में भाजपा में अपने एक करीबी हरेंद्र सिंह (जौनपुर) के पारिवारिक मांगलिक कार्यक्रम में शरीक होने बिना किसी सुरक्षा वाले तामझाम के पहुंचे थे। शादी-विवाह के सीजन में एवं अन्य किसी विशेष मौकों पर उनके ऐसे निजी टूर पूरे जूट मिल बेल्ट में चर्चा में रहते हैं।

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