Inside Fact : यूपी में 16 सीटों पर भाजपा के लिए संकटमोचक रही शून्य पर आउट हुई बसपा

डिजीटल डेस्क :  Inside Fact यूपी में 16 सीटों पर संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए संकटमोचक रही शून्य पर आउट हुई बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी। जारी हुए चुनावी नतीजों सीटवार मतों के बंटवारे में यही तस्वीर मुख्य रूप से उभरी है। इन सीटों पर बसपा अपने खाते में मिले वोट नहीं खींच पाती और वही वोट यदि सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशी को मिलते तो उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति और ज्यादा खराब हो सकती थी। इसीलिए भाजपा के लिए इस चुनाव में बसपा की फाइट लाभप्रद रही है।

संकटमोचक बसपा का साथ न मिलता तो यूपी में 19 सीटों पर सिमट जाती भाजपा

रोचक तथ्य यह है दिल्ली की सत्ता का रास्ता जिस यूपी से होकर जाता है, वहां लोकसभा चुनाव-2024 में बसपा खाली हाथ रही। यूपी में भी उसके खाते में एक भी सीट नहीं आई। कई सीटों पर वो तीसरे नंबर पर रही। चुनाव परिणाम के ब्योरे बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में बसपा कई अहम सीटों पर भाजपा के लिए संकटमोचक की भूमिका में रही। बसपा को उन सीटों पर उतने वोट नहीं मिलते तो भाजपा का शिकस्त तय माना जा रहा था। यूपी में भाजपा के खाते में 33 सीटें आई हैं। अगर इन भाजपा के लिए जिन 16 सीटों पर बसपा संकटमोचक रही, उनमें से 14 सीटों पर जीत बसपा के वजह से ही भाजपा खाते में गई जबकि दो भाजपा के सहयोगी दलों के खाते में । अगर वे 14 सीटें भाजपा के हाथों से फिसल जातीं तो फिर तस्वीर बदल जाती और यूपी में भाजपा के लोकसभा सदस्यों की संख्या 19 ही रह जाती जो कि मौजूदा रिजल्ट की तुलना में और बड़ा झटका होता।

पूर्वांचल के सैंपल से समझिए इस जमीनी सच्चाई को

लोकसभा चुनाव में सीटवार राजनीतिक दलों को मिले मतों का विश्लेषण करें तो यूपी के संबंध यह तस्वीर साफ तौर पहली नजर में सामने आ रही है। इसे पूर्वी यूपी यानी पूर्वांचल के सीटों के नतीजों से समझा जा सकता है। भदोही सीट पर इंडिया गठबंधन के ललितेश त्रिपाठी को 4.20 लाख वोट मिले जबकि जीत दर्ज करने वाले भाजपा के विनोद कुमार बिंद के खाते में 4 लाख 59 हजार 982 वोट आए। उन्होंने करीब 45 हजार वोटों से जीत हासिल की और तीसरे नंबर पर बसपा के हरिशंकर को 1 लाख 55 हजार वोट मिले। अगर यही वोट इंडिया के ललितेश त्रिपाठी के खाते में पड़ते तो तस्वीर बदल जाती। दूसरा कुर्मी बिरादरी की सियासत करने वाली भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल के मतों के ब्योरे भी यही सच सामने आता है। मिर्जापुर में अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल को 4 लाख 71 हजार 631 वोट मिले जबकि सपा के रमेश चंद बिंद को 4 लाख 33 हजार 821 वोट मिले। अनुप्रिया करीब 38 हजार वोटों से जीतीं और तीसरे नंबर पर रही बसपा के मनीष कुमार के खाते में 1 लाख 44 हजार 446 वोट आए। साफ है कि बसपा के यही वोट अनुप्रिया की जीत में अहम साबित हुए।

चुनाव परिणाम के ब्योरे बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में बसपा कई अहम सीटों पर भाजपा के लिए संकटमोचक की भूमिका में रही। बसपा को उन सीटों पर उतने वोट नहीं मिलते तो भाजपा का शिकस्त तय माना जा रहा था।
चंदौली से चुनाव जीतने के बाद सपा के वीरेंद्र सिंह

ऐसे ही अन्य सीटों पर भाजपा को मिला संकटमोचक का साथ

भदोही और मिर्जापुर सरीखा मतों के बंटवारे का नजारा चुनाव आयोग की ओर से जारी ब्योरों में अन्य 12 सीटों के लिए भी यही तथ्य पुष्ट करते हैं। इन सीटों में अकबरपुर, अलीगढ़, अमरोहा, बांसगांव, बिजनौर, देवरिया, फर्रुखाबाद, फतेहपुर सिकरी, हरदोई, मेरठ, मिसरिख, फूलपुर और उन्नाव शामिल हैं।

पश्चिमी यूपी में साथ आई रालोद को हुआ फायदा, घाटे में भाजपा

पश्चिमी यूपी के नतीजों ने भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। वहां भाजपा को राष्ट्रीय लोकदल का साथ रास नहीं आया। भगवा खेमे को भारी नुकसान उठाना पड़ा है जबकि रालोद को जरूर संजीवनी मिल गई। वह अपने हिस्से की बिजनौर और बागपत सीटें जीतने में कामयाब रही। रालोद ने जो दो सीटें जीतीं उसमें एक पहले से भाजपा के पास थी। सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल की सभी सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। मेरठ मंडल में भाजपा अपना पिछला प्रदर्शन दोहराने में काफी हद तक कामयाब रही। नगीना सीट पर आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर की जीत ने सभी को चौंका दिया है। चुनाव से ठीक पहले चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देना और जयंत चौधरी को अपने साथ लेना भी भाजपा के काम न आया।

राजपूतों की नाराजगी ने भी पश्चिमी यूपी में बिगाड़ा खेल

पश्चिमी यूपी में भाजपा के लिए मुजफ्फरनगर के सांसद संजीव बालियान का बयान और संगीत सोम की नाराजगी भी भारी पड़ गई। राजपूत समाज के लोगों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई पंचायतें की और भाजपा को हराने की कसमें खाईं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने राजपूतों को मनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन निष्फल रही। राजपूतों की नाराजगी ने न सिर्फ मुजफ्फरनगर सीट पर अपना असर दिखाया बल्कि सहारनपुर और कैराना में भी राजपूतों का काफी वोट कांग्रेस के प्रत्याशी इमरान मसूद और सपा की इकरा हसन के हक में गया। नतीजा यह हुआ कि इन तीनों सीटों पर भाजपा हार गई। खास बात यह रही कि मुजफ्फरनगर और कैराना सीट भाजपा ने 2014 में तब जीती थी, जब रालोद-सपा गठबंधन के साथ थी। भाजपा और रालोद साथ तो आ गए लेकिन जमीन पर इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच वह सूझबूझ नहीं दिखी जो गठबंधन में होनी चाहिए थी। कई स्थानों पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच मारपीट की घटना भी सामने आई। ऐसे में माना यह भी जा रहा है कि कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य न बिठा पाने का खामियाजा भी भाजपा को ही भुगतना पड़ा।

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