बांग्लादेश में तख्तापलट : शेख हसीना को हटा बहनोई आर्मी चीफ वकार-उज-जमान ने हथियाई सत्ता तो याद आए ‘बांग्लादेश के कसाई’ टिक्का खान

जनार्दन सिंह की रिपोर्ट

डिजीटल डेस्क : बांग्लादेश में तख्तापलट शेख हसीना को हटा बहनोई आर्मी चीफ वकार-उज-जमान ने हथियाई सत्ता तो याद आए ‘बांग्लादेश के कसाई’ टिक्का खान। आरक्षण की आग में बीते कुछ दिनों से सुलगने के बाद आखिरकार सोमवार को तख्तापलट हो गया। नतीजतन निवर्तमान पीएम शेख हसीना को न केवल पद से इस्तीफा देना पड़ा बल्कि देश छोड़ सुरक्षित ठिकाने को जाना पड़ा और उन्हें सत्ता से हटाकर सत्ता पर काबिज उन्हीं के चचेरे बहनोई आर्मी चीफ वकार-उज-जमान अब देश की कमान हाथों में ले चुके हैं। ऐसा होने के बाद ही शेख हसीना के करीबियों, समर्थकों के साथ भारतपंथियों व अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ उत्पात का जो दौर शुरू हुआ है और जो सूचनाएं लगातार आ रही हैं, उसने बरबस ही उस जनरल टिक्का खान की याद जेहन में ला दी है जिसे बांग्लादेश का कसाई कहा जाता है।

तख्तापलट के बाद प्रदर्शनकारियों के उत्पात का नया स्वरूप आया सामने

बांग्लादेश के आर्मी चीफ वकार-उज-जमान ने अंतरिम सरकार गठित करने का ऐलान किया तो हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी राजधानी ढाका में पीएम आवास में घुसे और जमकर उत्पात मचाया। मजे की बात यह रही कि सड़कों पर तैनात सेना मार्च करने वालों को रोक नहीं रही थी। बांग्लादेश के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति रहे शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति पर प्रदर्शनकारियों का गुस्सा फूटा और शेख हसीना की सियासी पार्टी अवामी लीग के लोगों पर हमले हुए। प्रदर्शनकारियों का यह गुस्सा बांग्लादेश को स्वाधीनता दिलाने वालों के वंशजों को सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी के आरक्षण को कमकर 5 फीसदी किए जाने पर नहीं थमा था और अब उनका गुस्सा बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों पर उतरता हुआ देखा जा रहा है। उसी क्रम में भारत और विशेषकर पश्चिम बंगाल में विशेष ऐहतियात बरतने की हिदायत दी गई है। भारतीय गृह मंत्रालय के साथ पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ ममता बनर्जी की सरकार भी इस मसले पर पैनी नजर बनाए हुए है। इसी क्रम में जहां सोशल मीडिया पर बांग्लादेश के नए सैनिक शासक की चर्चा हो रही है, वहीं टिक्का खान फिर से सबकी जुबां पर हैं। बांग्लादेश से जुड़े दोनों ही सैन्य अधिकारियों का किस्सा संक्षेप में इस रिपोर्ट में प्रस्तुत है।

बांग्लादेश में सत्ता की बागडोर संभालने वाले आर्मी चीफ वकार-उज-जमान
बांग्लादेश में सत्ता की बागडोर संभालने वाले आर्मी चीफ वकार-उज-जमान

बांग्लादेश के नए शासक वकार-उज-जमान का किस्सा जानिए…

इसी साल 23 जून को वकार-उज-जमान को बांग्लादेश के सेना प्रमुख पद की जिम्मेदारी दी गई थी। उन्होंने जनरल एस. एम. सैफुद्दीन की जगह ली थी। वर्ष 1985 में इन्फैंट्री कॉर्प्स के अफसर के रूप में नियुक्त हुए जमान अब सीजीएस (चीफ ऑफ जनरल स्टाफ) हैं और 16 सितंबर 1966 को शेरपुर जिले में जन्मे जमान ने डिफेंस सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है। जमान ने लंदन से रक्षा मामलों में मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली है और 20 दिसंबर 1985 में जमान को बांग्लादेश मिलिट्री अकादमी से ईस्ट बंगाल रेजिमेंट में 13वें बीएमए लॉन्ग कोर्स में कमीशन मिला था। उन्होंने एनसीओए (नॉन-कमीशन ऑफिसर अकादमी), एसआईएंडटी (स्कूल ऑफ इन्फैंट्री एंड टैक्टिक्स) और बीआईपीएसओटी (बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ पीस सपोर्ट ऑपरेशन ट्रेनिंग) में पढ़ाया भी है। वह सेना मुख्यालय में सैन्य सचिव शाखा में उप सहायक सैन्य सचिव रहे हैं।

शेख हसीना की चचेरी बहन से नए बांग्लादेशी शासक का हुआ है निकाह

बांग्लादेश के नए शासक बने वकार-उज-जमान ने सेना सुरक्षा इकाई में सेवा करते हुए 17वीं ईस्ट बंगाल रेजिमेंट की कमान संभाली है और  ढाका में 46वीं स्वतंत्र इन्फैंट्री ब्रिगेड को भी लीड किया है। वर्ष 2013 और 2017 में दो बार उनको सेना मुख्यालय में सैन्य सचिव की जिम्मेदारी दी गई। उसके बाद 9वीं इन्फैंट्री डिवीजन में जीओसी और सावर क्षेत्र का एरिया कमांडर बनाया गया। 30 नवंबर 2020 को जमान को लेफ्टिनेंट जनरल बनाया गया। उनका निकाह शेख हसीना के चाचा मुस्तफिजुर रहमान की बेटी बेगम साराहनाज कमालिका रहमान से हुआ। उनकी दो बेटियां हैं। मुस्तफिजुर रहमान 24 दिसंबर 1997 से 23 दिसंबर 2000 तक बांग्लादेश सेना के अध्यक्ष रहे थे।  मतलब बांग्लादेश में हुए तख्तापलट में शेख हसीना को उनके ही चचेरे बहनोई ने बाहर का रास्ता दिखाया है।

जनरल टिक्का खान की फाइल फोटो
जनरल टिक्का खान की फाइल फोटो

अब जानिए बांग्लादेश के कसाई टिक्का खान के बारे में जिसे टाइम मैगजीन यह संज्ञा दी

बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद सेना शांति रखने की अपील कर रही है, लेकिन हालात थम नहीं रहे तो बांग्लादेश के उस कसाई जिक्र तेजी से सुर्खियों में हैं जो 9 महीने में 2 लाख औरतों व लड़कियों के साथ दुष्कर्म का और एक ही रात में 7 हजार मौतों के लिए जिम्मेदार था। उस बांग्लादेश के कसाई का नाम था टिक्का खान। टिक्का खान की बर्बरता की कहानी 1969 में शुरू हुई जब पाकिस्तान में याह्या खान ने राष्ट्रपति की कुर्सी संभाली। यह वो दौर था जब पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के अलग होने की मांग तेज हो गई थी। हालात बिगड़ने लगे थे और उसे संभालने के लिए टिक्का खान को पूर्वी पाकिस्तान रवाना किया गया। बांग्लादेश पहुंचते ही उसने सैन्य कार्रवाई शुरू की। सख्ती से अपने ऑपरेशन को लागू करना शुरू किया और अपने ऑपरेशन को नाम दिया ऑपरेशन सर्चलाइट। पूरे ऑपरेशन के दौरान उसने इंसानों के साथ जानवरों की तरह व्यवहार किया और उस ऑपरेशन में एक रात ऐसी भी आई जब उसने बर्बरता की हदें पार कर दी। विरोध को दबाने के लिए बच्चे और महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक को मौत के घाट उतार दिया। एक रात में 7 हजार लोगों का नरसंहार किया। उस नरसंहार की कहानी लिखने वाले रॉबर्ट पेन ने अपनी किताब में बताया है कि 1971 में 9 महीनों के अंदर दो लाख औरतों और लड़कियों का बलात्कार किया गया। उस घटना पर टाइम मैग्जीन ने टिक्का खान को बांग्लादेश का कसाई कहा था।

रावलपिंडी में जन्मे और देहरादून में पढ़े टिक्का खान के नाम से कांपते थे बांग्लादेशी

वर्ष 1969 से 1971 के बीच बांग्लादेश में टिक्का खान का नाम सुनकर लोगों की रूह कांप जाती थी। रावलपिंडी के गांव में जन्मे टिक्का खान ने देहरादून के भारतीय सैन्य अकादमी से पढ़ाई की और 1935 में ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुआ। साल 1940 में कमीशंड ऑफिसर बनने के बाद जर्मनी के खिलाफ दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा लिया। फिर वर्ष 1947 में जब भारत और पाकिस्तान अलग हुए तो टिक्का खान ने पाकिस्तान को चुना और वहां की सेना में मेजर का पद संभाला। वर्ष 1965 में हुई भारत-पाक युद्ध में भी हिस्सा लिया। बांग्लादेश के आजाद होने के बाद जब तक हालात सामान्य हुए तब तक टिक्का खान पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका था। पाकिस्तान के लोगों ने भी उसकी करतूत की आलोचना की लेकिन उसके बावजूद उस पर कोई असर नहीं हुआ। ऑपरेशन सर्चलाइट को अंजाम देने के बाद पाकिस्तानी सेना में उसका कद और बढ़ गया। प्रमोशन पर प्रमोशन मिलते चले गए। वर्ष 1972 में उसे पाकिस्तान का पहला थल सेना अध्यक्ष बनाया गया और करीब 4 साल तक इस पद पर रहने के बाद रिटायर हो गया। बाद में 87 साल की उम्र में 28 मार्च, 2002 को रावलपिंडी में टिक्का खान ने अंतिम सांस ली।

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