रानी के किले पर विरोधियों का हमला : झारखंड की राजनीति में नया मोड़

गिरिडीह :  झारखंड की सियासत में फिर से उथल-पुथल मची है। एक समय था जब जयराम महतो और अकील अख्तर उर्फ रिजवान की जोड़ी को “एक जिस्म दो जान” के रूप में जाना जाता था। जयराम महतो, जेएलकेएम के सुप्रीमो और भाषा आंदोलन के मुख्य चेहरे, हमेशा रिजवान के साथ खड़े रहे थे। लेकिन अब, इसी रिजवान ने जयराम महतो को जोर का झटका देते हुए झामुमो का दामन थाम लिया है। रिजवान ने ना केवल झामुमो की सदस्यता ग्रहण की, बल्कि झामुमो की उम्मीदवार कल्पना सोरेन के समर्थन में अपनी गांडेय सीट से उम्मीदवारी भी वापस ले ली। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में रिजवान ने रांची में झामुमो में शामिल होकर जेएलकेएम को एक बड़ा धक्का दे दिया।

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इस कदम से न केवल जयराम महतो के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं, बल्कि गांडेय में जेएलकेएम का प्रतिनिधित्व भी समाप्त हो गया है। अब जेएलकेएम के पास दूसरा उम्मीदवार उतारने का मौका भी खत्म हो चुका है, क्योंकि नामांकन की तारीख पार हो गई है। रिजवान का यह निर्णय बीजेपी और आजसू गठबंधन के लिए भी एक झटका है, क्योंकि मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना अब कम हो गई है, जिससे झामुमो को बढ़त मिल सकती है।

वहीं, दूसरी ओर, इस पूरे खेल में एक और बड़ा चेहरा उभर कर आया है – हेमंत सोरेन की पत्नी, कल्पना सोरेन। सीएम हेमंत सोरेन के 31 जनवरी 2024 को ईडी द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद, कल्पना सोरेन झामुमो की स्टार प्रचारक बनकर सामने आईं हैं। हालिया लोकसभा और गांडेय उपचुनाव में उन्होंने बीजेपी-आजसू के दमदार प्रत्याशियों को शिकस्त दी, और साबित कर दिया कि “रानी के किले को हिलाना आसान नहीं है।” अपनी पहली ही चुनावी लड़ाई में, कल्पना सोरेन ने बीजेपी के दिलीप वर्मा को भारी अंतर से हराया।

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इन उपचुनावों में मिली जीत ने कल्पना सोरेन के राजनीतिक कद को और मजबूत कर दिया। जहां एक ओर कोडरमा लोकसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी अन्नपूर्णा देवी को इंडिया अलायंस के प्रत्याशी विनोद कुमार सिंह से अधिक वोट मिले, वहीं गांडेय विधानसभा उपचुनाव में कल्पना सोरेन को मिले भारी समर्थन ने साबित कर दिया कि उनका करिश्माई नेतृत्व और झामुमो की रणनीति रंग लाई है।

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अब 20 नवंबर को होने वाले गांडेय उपचुनाव के लिए बीजेपी और आजसू ने अपने साझा उम्मीदवार के साथ “रानी के किले” को चुनौती देने की तैयारी कर ली है। इस बार उन्होंने एक मजबूत प्रत्याशी उतारने का लक्ष्य रखा है ताकि कल्पना सोरेन को उनकी जीत के किले में ही घेरा जा सके। लेकिन, इस संघर्ष में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या “कट्टर समर्थक से बने विरोधी” और विपक्षी गठबंधन की रणनीति, कल्पना सोरेन के इस मजबूत किले को हिला पाएगी, या फिर झामुमो की रानी एक बार फिर जीत के परचम को फहराएगी।

झारखंड की सियासत में आए इस नए मोड़ ने यह साबित कर दिया है कि यहां की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है, और हर क्षण एक नया खेल रचा जाता है।

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