रांची: झारखंड में चुनावी माहौल गरम है। दूसरे फेज में 38 सीटों पर 20 नवंबर को मतदान होगा। लेकिन असली कहानी इन 38 सीटों में छुपी 35 सीटों की है, जहां जीत-हार का अंतर हमेशा इतना कम रहा है कि परिणाम बदलने के लिए बस एक बार ‘मूड स्विंग’ काफी है। यह वो सीटें हैं, जो हर बार अपनी अनिश्चितता के लिए जानी जाती हैं। वोटों का मार्जिन इतना कम कि नेता जीत की मिठाई का ऑर्डर भी देने से डरते हैं।
कम मार्जिन का सस्पेंस: हर वोट का खेल
2005 से लेकर 2019 तक के विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड देख लीजिए। 2005 में 11 सीटें, 2009 में 10, और 2014 व 2019 में 7-7 सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत का अंतर बेहद कम था। दिलचस्प बात यह है कि इन सीटों पर 9 ऐसे क्षेत्र हैं, जहां लगातार दो या तीन चुनावों में भी यही सीन रिपीट हुआ। लगता है, इन सीटों पर जनता वोट नहीं देती, बल्कि नेता खुद ही अपनी हार-जीत का ताना-बाना बुनते हैं।
वोटों का यह मामूली अंतर न सिर्फ प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करता है, बल्कि सरकार बनाने और गिराने का खेल भी यहीं से तय होता है। 702 वोटों से हारने वाले उम्मीदवार अगले चुनाव में 705 वोटों से जीत जाते हैं। यह सब कुछ ऐसा है जैसे सियासी लॉटरी, जिसमें किस्मत और रणनीति दोनों मिलकर खेलते हैं।
पार्टी बदलने का नया ट्रेंड
इस बार का चुनाव एक और वजह से दिलचस्प है। यहां के 10 प्रत्याशी ‘ऑल राउंडर’ निकले हैं। ये पहले एक गठबंधन के सिपाही थे, अब दूसरे गठबंधन के झंडाबरदार बन गए हैं। जनता कन्फ्यूज है कि इन्हें वोट क्यों दें—पिछली पार्टी के काम के लिए, या नई पार्टी के वादों के लिए?
राजनीति का यह पैंतरा नया नहीं है। पर, इस बार जनता के बीच चर्चा है कि “असली खिलाड़ी वही जो हर पिच पर खेल जाए।” उम्मीदवारों ने अपनी पार्टी बदलकर यह दिखा दिया है कि उनके लिए विचारधारा नहीं, सिर्फ जीत मायने रखती है। मतदाता सोच रहे हैं कि जो नेता कल तक किसी और पार्टी का ‘घोषणापत्र’ पढ़ रहे थे, आज उसी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।
कम मार्जिन वाली सीटें: गठबंधन के लिए सिरदर्द
ये सीटें दोनों प्रमुख गठबंधनों के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। महागठबंधन और एनडीए दोनों जानते हैं कि यहां की जनता का मूड पल में बदल सकता है। राजनीतिक दलों के लिए यह सीटें ‘डील ब्रेकर’ या ‘डील मेकर’ साबित हो सकती हैं।
छोटे मार्जिन वाली इन सीटों पर प्रत्याशी न जाने कितने जतन कर रहे हैं। कोई रात-दिन घर-घर घूम रहा है, तो कोई ‘सोशल मीडिया योद्धा’ बन चुका है। सबका मकसद एक है—किसी भी हाल में वोटर को अपने पक्ष में करना। लेकिन वोटर भी अब होशियार हो गया है। उसे पता है कि इन नेताओं का प्यार सिर्फ चुनाव तक सीमित है।
जनता का असली सवाल
झारखंड के मतदाता अब नेताओं से सिर्फ एक सवाल पूछ रहे हैं—“इस बार जीतने के बाद अगली बार किस पार्टी से आएंगे?” यह सवाल नेताओं के लिए किसी तीर से कम नहीं। जनता का भरोसा जीतने के लिए अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि ठोस काम दिखाना होगा।
झारखंड की यह सियासी लड़ाई अब अपने चरम पर है। 20 नवंबर का दिन बताएगा कि कौन बाजी मारता है। लेकिन एक बात तय है, कम मार्जिन वाली इन सीटों का रोमांच हर बार की तरह इस बार भी चरम पर होगा। जीत का ताज किसके सिर सजेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन जनता का मनोरंजन पक्का है। आखिरकार, झारखंड की राजनीति का यही तो असली ‘मसाला’ है!







