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From Shraddha to Buddha: Bihar का Gaya Ji ढाई हजार साल का इतिहास , Gaya Ji History & Bodh Gaya Tourism

 बिहार का Gaya Ji ढाई हजार साल के इतिहास, पिंडदान परंपरा और बुद्ध की ज्ञानस्थली बोधगया का साक्षी है, जहां धर्म और संस्कृति मिलते हैं।


From Shraddha to Buddha: गया: बिहार के हृदय में बसा गया जी महज एक शहर नहीं, बल्कि हिंदू-बौद्ध सभ्यता की एक जीवंत विरासत है। यहां जहां एक ओर हिंदुओं के पुरखों का पिंडदान होता है, वहीं दूसरी ओर बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। आधिकारिक रूप से हाल ही में इसका नाम गया से गया जी किया गया है। पहाड़ियों से घिरे इस प्राचीन शहर का इतिहास ढाई हजार साल पुराना है और इसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं।

From Shraddha to Buddha: गयासुर की पौराणिक कथा से मिला नाम

गया का नाम गयासुर नामक राक्षस से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सभी देवी-देवताओं से भी गयासुर नहीं सधा, तो भगवान विष्णु ने अपने चरणों से उसे दबा दिया था। यही स्थान आज विष्णुपद मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वायु पुराण में भी गयासुर की मिलती-जुलती कहानी मिलती है।

डॉ. राजेंद्र लाल मित्रा ने अपनी शोध में गयासुर की कहानी को बौद्ध धर्म से जोड़कर पेश किया है। उनके अनुसार, गयासुर और बौद्ध धर्म दोनों ने मोक्ष को आसान बना दिया था, जिसका विरोध करने के लिए ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु द्वारा असुर वध का वर्णन जोड़ा गया।

From Shraddha to Buddha: बुद्ध के ज्ञान की भूमि बोधगया

गया की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहीं निरंजना नदी (आज की फलगू नदी) के तट पर पीपल के पेड़ के नीचे छह साल तक तपस्या के बाद सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे गौतम बुद्ध कहलाए। यह स्थान आज बोधगया के नाम से विश्वप्रसिद्ध है।

सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्यूएनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में इस बोधी वृक्ष का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने लिखा कि बंगाल के क्रूर शासक शशांक ने पुराने बोधी वृक्ष को काट डाला था और नई कोंपल को रोकने के लिए गन्ने के रस से सींचा था, लेकिन राजा पूर्णवर्मा ने नई शाखा लगाई।

आज का बोधी वृक्ष उसी स्थान पर छठी पीढ़ी का पेड़ है। तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक ने यहां भिक्षुओं के लिए विहार बनवाया था। आज यह स्थान भव्य महाबोधी मंदिर के रूप में विकसित हो चुका है, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है।

From Shraddha to Buddha: अलेक्जेंडर कनिंघम का ऐतिहासिक सर्वेक्षण

1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक अलेक्जेंडर कनिंघम ने गया का विस्तृत सर्वेक्षण किया था। उन्होंने चीनी यात्री ह्यूएनसांग की यात्रा को आधार बनाकर इस क्षेत्र का अध्ययन किया। 1865 में जब गया को एक अलग जिला बनाया गया, तो ASI की पहली रिपोर्ट में गया और बोधगया के अध्याय सबसे पहले रखे गए।

कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि गया के सबसे प्रमुख स्थानों में विष्णुपद मंदिर है, जो गयासुर नामक राक्षस की कहानी से जुड़ा है। उनके सर्वेक्षण से पता चला कि यह शहर हजारों साल पुराना है।

From Shraddha to Buddha: पहाड़ियों से घिरी पवित्र भूमि

गया भौगोलिक रूप से चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। दक्षिण में ब्रह्मयोनी पर्वत है, जहां शक्ति को समर्पित ब्रह्मयोनि मंदिर 11वीं सदी में बना था। 1633 में मुगल शासक औरंगजेब के पुत्र औरंग शाह ने इसे तोड़ा था।

उत्तर में रामशिला पहाड़ियां हैं, जहां 11वीं सदी का पातालेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। उत्तर-पश्चिम में प्रेतशिला पर्वत है, जहां अहिल्याबाई होलकर ने भटकते प्रेतों के लिए एक स्थान बनवाया था।

फलगू नदी के पूर्वी तट पर एक पहाड़ी से पाल वंश के चौथे राजा महेंद्रपाल देव का शिलालेख मिला है, जो गया के इतिहास को और भी पीछे ले जाता है।

From Shraddha to Buddha: श्राद्ध परंपरा और सीता का पिंडदान

गया हिंदुओं के लिए श्राद्ध कर्म का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। अथर्ववेद, यम स्मृति और पौराणिक ग्रंथों में इसका निरंतर उल्लेख मिलता है। हर साल अश्विन मास (सितंबर-अक्टूबर) में 15 दिनों तक हजारों हिंदू अपने पुरखों के श्राद्ध के लिए यहां आते हैं।

रामायण से जुड़ी एक रोचक कथा के अनुसार, जब राजा दशरथ का देहांत हुआ तो राम वनवास में थे। पिता के श्राद्ध के लिए राम और लक्ष्मण गया आए। जब वे सामान लेने गए तो सीता ने पंडित जी के साथ रेत के पिंड बनाकर श्राद्ध संपन्न किया। इस घटना की गवाही आज भी अक्षयवट (बरगद का पेड़) देता है।

आज भी सीताकुंड पर रेत के पिंड से पिंडदान होता है। 1980 के दशक में मिथिला की महिलाओं ने सीता जी के मायके से आने के कारण श्राद्ध में महिलाओं की भागीदारी फिर से शुरू करवाई।

From Shraddha to Buddha: वैदिक काल से राजनीतिक इतिहास तक

वैदिक काल में जब आर्य उत्तर-पश्चिम से गंगा की ओर बढ़े तो उन्हें कीकट राज्य से चुनौती मिली थी। कीकट राज्य की पहचान आज के मगध डिवीजन से होती है, जिसमें गया भी शामिल है।

मध्यकालीन इतिहास में गया ने मगध साम्राज्य का विस्तार देखा, बंगाल के शासक शशांक का क्रोध झेला, खिलजी के आक्रमण का सामना किया और मुगलकाल की उथल-पुथल देखी।

आधुनिक काल में 1922 में यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ और स्वराज पार्टी की नींव भी यहीं रखी गई। ब्रिटिश शासन के दौरान 1865 में गया को अलग जिला बनाया गया।

From Shraddha to Buddha: आज का गया जी

आज गया जी न केवल धार्मिक पर्यटन का केंद्र है, बल्कि भारत की समन्वयवादी संस्कृति का जीवंत उदाहरण भी है। यहां हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों के अनुयायी अपनी-अपनी आस्था के साथ आते हैं। नागरी और बराबर की गुफाएं इसके प्राचीन इतिहास की गवाही देती हैं।

पंडे और पुरोहित पीढ़ियों से पोथी-पांडुलिपियों में परिवारों का हिसाब रखते आ रहे हैं। विदेशों से भी बौद्ध श्रद्धालु बोधगया आते हैं। यह शहर सच्चे अर्थों में भारत की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को जीवंत रखे हुए है।

गया का इतिहास केवल पुरातत्व या धर्म का नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के निरंतर प्रवाह का इतिहास है, जो आज भी अबाध गति से आगे बढ़ रहा है।

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