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कोसी की सियासत: जहां हर गली में चुनाव है और हर चौपाल में ‘मुख्यमंत्री’ बैठा है!

कोसी की सियासत पर व्यंग्य: जहां नेता हर चौपाल में मुख्यमंत्री बनते हैं और जनता वोट डालकर सोचती है – अब अगला ‘सीजन’ कब आएगा!


कोसी की सियासत: पटना: कोसी की धरती इस बार फिर चुनावी तापमान पर उबल रही है। यहां के लोगों को मानसून से ज्यादा इंतज़ार चुनावी मौसम का रहता है – क्योंकि उसी में सड़कों की मरम्मत होती है, पंडाल सजते हैं और नेता “जनता जनार्दन” कहते हुए धरती पर उतर आते हैं।

कोसी की सियासत: सहरसा में नेता ज्यादा, सीटें कम

सहरसा में चुनाव ऐसा है जैसे किसी शादी में दूल्हा एक और बाराती दस!
भाजपा के डॉ. आलोक रंजन फिर मैदान में हैं – उन्हें यकीन है कि जनता उनके नाम की “डिग्री” को दोबारा पास कराएगी।
उधर महागठबंधन के आईपी गुप्ता कह रहे हैं – “इस बार जनता ने मन बना लिया है।”
कौन-सी जनता? वही जो अब तक पानी और बिजली की उम्मीद में “मन बदलती” रही है।

जनसुराज के किशोर कुमार मुन्ना इस लड़ाई में तीसरे कोने से उतर आए हैं। उनके समर्थक कहते हैं – “हम बदलाव लाएंगे।”
कौन सा बदलाव?
वो बताते नहीं, बस मुस्कुरा देते हैं – शायद “साइलेंट मोड” वाली राजनीति है।


 Key Highlights:

  • कोसी में अब धूल नहीं उड़ती, “वोट” उड़ते हैं – और हर नेता को लगता है हवा उसकी दिशा में है।

  • एनडीए कह रहा – “हमारा किला मजबूत है”, मगर दीवारें महागठबंधन के पोस्टर से ढकी पड़ी हैं।

  • जनसुराज आया तो सियासी कैलकुलेटर भी हैंग हो गया – कोई नहीं बता पा रहा कौन किसका वोट काटेगा।

  • सहरसा में नेताजी ज्यादा हैं, सीटें कम; सबको लगता है जनता सिर्फ उन्हीं की आशीर्वाद लेने आई है।

  • मधेपुरा में हर चौक पर “यादव समीकरण” का नया संस्करण निकलता है – जैसे मोबाइल का अपडेट।


कोसी की सियासत: मधेपुरा में समीकरण ऐसे जैसे गणित का पेपर

मधेपुरा की राजनीति तो जैसे हर चुनाव में ‘बीजगणित’ बन जाती है।
यहां हर उम्मीदवार के समर्थक को लगता है कि “हमारे वोट तो पक्के हैं”, लेकिन बूथ पर पहुंचते ही ईवीएम की बत्ती सबकी उम्मीद बुझा देती है।
जनसुराज, राजद, जदयू और निर्दलीय – सबको लगता है वही “विकल्प” हैं। जनता सोच रही है, “इतने विकल्प कि अब चुनाव नहीं, ऑनलाइन पोल लग रहा है।”

रेणु कुशवाहा और निरंजन मेहता की भिड़ंत तो ऐसी है कि गांवों में लोग कहने लगे – “देखो, फिर वही ‘मेहता बनाम मंत्री’ सीजन 3 आ गया!”

कोसी की सियासत: सुपौल में एनडीए का किला, मगर दीवारों पर दरार

सुपौल में एनडीए का किला मजबूत बताया जा रहा है, लेकिन हर दीवार पर कांग्रेस और जनसुराज के पोस्टर चिपके हैं।
बिजेंद्र यादव कहते हैं – “हम जनता की सेवा कर रहे हैं।”
जनता कहती है – “सेवा याद नहीं, लेकिन पोस्टर जरूर याद हैं।”

निर्मली और पिपरा में मुकाबला ऐसा है कि लोगों को अब नेता का नाम याद नहीं, पार्टी का प्रतीक ही काफी है।
किसी को तीर पसंद है, किसी को पंजा, किसी को तराजू – लेकिन सबका निशाना एक ही: “वोट बैंक”।

कोसी की सियासत: कोसी का मूड

कोसी के लोग आजकल कहते हैं – “अब यहां राजनीति नहीं, रियलिटी शो चलता है।”
हर उम्मीदवार कहता है – “मैं जनता का बेटा हूं।”
जनता पूछती है – “फिर घर कब आओगे?”
वो मुस्कुराकर हाथ जोड़ लेते हैं – “चुनाव के बाद ज़रूर!”

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