पटना : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थल कुम्हरार पार्क का निरीक्षण किया। निरीक्षण के क्रम में मुख्यमंत्री ने कुम्हरार पार्क परिसर में संरक्षित किए गए मगध साम्राज्य काल से संबंधित स्तम्भ के अवशेषों को देखा। पार्क में बुलंदीबाग उत्खनन, कुम्हरार उत्खनन व मौर्यकालीन अस्सी स्तंभों युक्त विशाल कक्ष आदि से जुड़ी जानकारी से संबंधित लगे बोर्ड का मुख्यमंत्री ने अवलोकन किया।
नीतीश कुमार ने लगाई गई चित्र प्रदर्शनी का किया अवलोकन
इस दौरान मुख्यमंत्री ने कृष्णदेव स्मृति सभागार स्थित पाटलीपुत्र दीर्घा में कुम्हरार के मौर्य वास्तुकला, भौतिक सांस्कृतिक आयाम, कुम्हरार उत्खनन संबंधी भग्नावशेष, पाटलीपुत्र की कला, संस्कृतियों का प्रभाव आदि से संबंधित लगाई गई चित्र प्रदर्शनी का अवलोकन किया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि कुम्हरार पार्क परिसर भारत सरकार के अधीन है, जिसका रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जा रहा है। पूर्व में यहां किए गए उत्खनन में कई प्राचीन एवं ऐतिहासिक वस्तुएं एवं निर्माण संबंधी अवशेष मिले हैं।


CM ने कुम्हरार पार्क परिसर को बेहतर ढंग से विकसित करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखने हेतु अधिकारियों को दिया निर्देश
मुख्यमंत्री ने कुम्हरार पार्क परिसर को बेहतर ढंग से विकसित करने के लिए भारत सरकार को पत्र लिखने हेतु अधिकारियों को निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि कुम्हरार पार्क काफी ऐतिहासिक और प्राचीन स्थल है, जो मगध साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। कुम्हरार पार्क काफी बड़ा है, काफी तादाद में लोग यहां घूमने आते हैं। इस पार्क परिसर के साथ-साथ प्रदर्शों का रखरखाव और बेहतर ढंग से किया जाना चाहिए। इस स्थल से जुड़ी जानकारी को जानने और समझने के लिए इतिहास के विद्यार्थी व इतिहास में रुचि रखने वाले लोग देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा अन्य देशों से भी यहां आते हैं, जिसे ध्यान में रखते हुए इस पार्क परिसर का सौंदर्गीकरण कराया जाना आवश्यक है।

वर्ष 1912-15 व 1951-55 में इस पुरास्थल की खुदाई के दौरान 80 स्तम्भयुक्त मौर्यकालीन एक विशाल कक्ष प्रकाश में आया
गौरतलब है कि वर्ष 1912-15 एवं 1951-55 में इस पुरास्थल की खुदाई के दौरान 80 स्तम्भयुक्त मौर्यकालीन एक विशाल कक्ष (सभागार) प्रकाश में आया, जिसके भू-विन्यास में स्तम्भों की 10 पंक्ति पूरब से पश्चिम एवं आठ पंक्ति उत्तर से दक्षिण हैं, स्तम्भों एवं पंक्तियों के मध्य लगभग 15 फीट का अंतराल है। सभागार दक्षिणाभिमुख है। पुरास्थल के चारों ओर हुई विकास गतिविधियों एवं भू-जल स्तर में वृद्धि के कारण भग्नावशेष जलमग्न हो गए। फलस्वरूप स्तम्भों व पुरावशेषों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया। तत्पश्चात पुरावशेषों की संरक्षा व उत्तरजीविता को दृष्टिगत रखते हुए उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर सन 2005 में उक्त स्थल को मिट्टी व बालू से भर दिया गया।

प्राचीन काल में आधुनिक पटना शहर को पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था
प्राचीन काल में आधुनिक पटना शहर को पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। 6ठीं शताब्दी ईसा पूर्व जब भगवान बुद्ध ने इस स्थल का दौरा किया, तब पाटलिग्राम एक छोटा सा गांव था। उस समय मगध साम्राज्य के राजा अजातशत्रु पाटलिग्राम को वैशाली के लिच्छवी शासकों से बचाने के लिए उसके चारों ओर एक किले का निर्माण करा रहे थे। बाद में 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य में राजा उदयन ने रणनीतिक एवं व्यापारिक कारणों से अपनी राजधानी को राजगृह (राजगीर) से पाटलिपुत्र में स्थानांतरित करने का फैसला किया। वह अजातशत्रु के उत्तराधिकारी और पुत्र थे। मेगास्थनीज जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में प्रसिद्ध यूनानी राजदूत थे, उन्होंने पाटलिपुत्र उसकी नगरपालिका और प्रशासन का विस्तृत विवरण दिया है। मेगास्थनीज की इंडिका नामक पुस्तक में इस नगर का उल्लेख पालिबोथरा के रूप में मिलता है।

यह शहर गंगा नदी के किनारे लगभग 14 किलोमीटर पूर्व-पश्चिम और 3 किलोमीटर उत्तर-दक्षिण में फैला हुआ था
इस पुस्तक के अनुसार, यह शहर गंगा नदी के किनारे लगभग 14 किलोमीटर पूर्व-पश्चिम और तीन किलोमीटर उत्तर-दक्षिण में फैला हुआ था। यह एक समानांतर चतुर्भुज आकार का था। शहर का परिमाप लगभग 36 किलोमीटर था। शहर को बड़े पैमाने पर लकड़ी के खंभों की चारदीवारों द्वारा सुरक्षित किया गया था, जिसके आगे एक चौड़ी और गहरी खाई थी जो शहर की नाली के रूप में भी काम करती थी।


चन्द्रगुप्त मौर्य के लकड़ी से बने सुंदर महल का भी उल्लेख वस्तृत प्राचीरों का उल्लेख किया है
उन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य के लकड़ी से बने सुंदर महल का भी उल्लेख वस्तृत प्राचीरों का उल्लेख किया है। 1892-1955 की उत्खनन में इन ब्योरों में उल्लेखित लकड़ी के खंभे प्राचीर-नालियां मौर्य स्तम्भ वाला हॉल, पॉलिस किए गए स्तंभों के अवशेष सामने आए। प्रसिद्ध चीनी यात्री फां-हियान, जिन्होंने लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभ में इस स्थान का दौरा किया था। उन्होंने पाटलिपुत्र को एक समृद्ध शहर और शिक्षा का एक प्रसिद्ध केंद्र बताया है। एक प्रसिद्ध चीनी यात्री वेनत्सांग ने भी 7वीं शताब्दी के दौरान इस शहर का दौरा किया, तब तक अधिकांश शहर खंडहर हो चुका था। पाटलिपुत्र पाल शासको की भी राजधानी रही। उसके बाद इस नगर ने राजधानी का दर्जा खो दिया, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।

वर्तमान में 80 स्तंभों वाला हॉल के उत्खनित स्थल को ढंक दिया गया है व कुछ स्तंभ अवशेष ही देखे जा सकते हैं
वर्तमान में 80 स्तंभों वाला हॉल के उत्खनित स्थल को ढंक दिया गया है और कुछ स्तंभ अवशेष ही देखे जा सकते हैं। यहां स्थित पाटलिपुत्र दीर्घा इस प्राचीन शहर के इतिहास, इसकी कला, वास्तुकला, बुलंदीबाग और कुम्हरार स्थलों के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों को प्रदर्शित करती है। निरीक्षण के दौरान जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार, मुख्यमंत्री के सचिव कुमार रवि और जिलाधिकारी डॉ. त्यागराजन एसएम सहित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारी मौजूद थे।

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