Giridih News: गिरिडीह जिले के जमुआ प्रखंड स्थित खरगडीहा लंगटा बाबा समाधि स्थल सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी एकता का जीवंत प्रतीक है. झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में बाबा की ख्याति फैली हुई है. प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां चादरपोशी कर मन्नतें मांगते हैं और अपनी मुरादें पूरी होने का अनुभव करते हैं. इसी क्रम में प्रत्येक वर्ष पौष पूर्णिमा के अवसर पर लंगटा बाबा मेला का भव्य आयोजन होता है. इस वर्ष यह मेला 3 जनवरी को आयोजित होगा.
Giridih News: सभी समुदायों के श्रद्धालु प्रतिदिन यहां टेकते हैं माथा
जमुआ प्रखंड मुख्यालय से करीब सात किलोमीटर दूर, देवघर मुख्यमार्ग पर उसरी नदी के किनारे स्थित इस समाधि स्थल पर सभी धर्मों के लोगों की अटूट आस्था है. हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई, सभी समुदायों के श्रद्धालु प्रतिदिन यहां माथा टेकने पहुंचते हैं. पौष पूर्णिमा के दिन तो भक्ति और श्रद्धा का जनसैलाब उमड़ पड़ता है. झारखंड के अलावा अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु चादरपोशी के लिए पहुंचते हैं. इस अवसर पर साधु-संतों का जमावड़ा लगता है, वहीं मंत्री, सांसद, विधायक, जिला के जज अधिकारी और जनप्रतिनिधियों का भी आगमन होता है.
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Giridih News: इस वजह से यहां लगता है मेला
कालजयी संत लंगेश्वरी बाबा उर्फ लंगटा बाबा ने वर्ष 1910 में पौष पूर्णिमा के दिन महा समाधि ली थी. मान्यता है कि 1870 के दशक में वे नागा साधुओं की एक टोली के साथ खरगडीहा पहुंचे थे. कुछ दिनों बाद टोली आगे बढ़ गई, लेकिन एक साधु थाना परिसर में ही नंग धड़ंग अवस्था में धूनी रमाए बैठा रहा. अपने चमत्कारिक गुणों और करुणा के कारण वही साधु आगे चलकर लंगटा बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
Giridih News: बाबा की कई चमत्कारी कथा आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं
बाबा की करुणा और चमत्कारों की अनेक कथाएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं. कहा जाता है कि एक बार गंभीर रूप से घायल एक कुत्ता उनके पास आया. बाबा के आशीर्वाद के बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया. इसी तरह, एक समय खरगडीहा में फैले गंभीर बीमारी के दौरान, जब लोग गांव छोड़कर भाग रहे थे, बाबा के कहने से रोग का प्रकोप समाप्त हो गया. वे न केवल पीड़ित मानवता के लिए, बल्कि समस्त प्राणियों के लिए दया की मूर्ति थे.
Giridih News: श्रद्धालुओं से भेंट स्वीकार करने का तरीका था बाबा का अनोखा
श्रद्धालुओं से प्राप्त भेंट स्वीकार करने का उनका तरीका भी अनोखा था. जिसे वे स्वीकार नहीं करते, उसे ‘ठंडी करो महाराज’ कहकर कुएं में फेंकवा देते थे. यह कुआं आज भी समाधि परिसर में मौजूद है. बाबा के महा समाधि लेने के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों में मतभेद उत्पन्न हो गया था. बाद में क्षेत्र के प्रबुद्ध लोगों के निर्णय से दोनों धर्मों की परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया.
तभी से हर वर्ष पौष पूर्णिमा पर यहां मेला लगता है. मेले में उमड़ने वाली अपार भीड़ इस बात का प्रमाण है कि पीड़ित मानवता की रक्षा करने वाले संत लंगटा बाबा आज भी लोगों के हृदय में जीवित हैं और उनका संदेश आज के दौर में भी सामाजिक सौहार्द को मजबूत कर रहा है.
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