झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को लोक कल्याण और आदिवासी आंदोलन में योगदान के लिए मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
Tribal Leader of Jharkhand रांचीः झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड आंदोलन के पुरोधा रहे स्वर्गीय दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। केंद्र सरकार ने रविवार को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की, जिसमें लोक कल्याण के क्षेत्र में उनके दीर्घकालिक योगदान को मान्यता दी गई। यह सम्मान उनके संघर्षपूर्ण सार्वजनिक जीवन और आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए किए गए आंदोलनों को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार करता है।
Tribal Leader of Jharkhand:संघर्ष से नेतृत्व तक गुरुजी की जीवन यात्रा
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या तब हुई, जब वे मात्र 13 वर्ष के थे। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने महाजनों और शोषण के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की और ग्रामीणों को संगठित कर उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। भूमि आंदोलन के जरिए उन्होंने बड़ी संख्या में ग्रामीणों को उनकी जमीन वापस दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इसी दौर में वे गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
Key Highlights
दिशोम गुरु शिबू सोरेन को लोक कल्याण के क्षेत्र में योगदान के लिए मरणोपरांत पद्म भूषण।
आदिवासी अधिकार और भूमि आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में राष्ट्रीय पहचान।
झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री और आठ बार लोकसभा सांसद रहे।
संथाल परगना से शुरू हुआ संघर्ष राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा।
झारखंड आंदोलन को जनआंदोलन बनाने में निर्णायक भूमिका।
Tribal Leader of Jharkhand:संथाल से राष्ट्रीय राजनीति तक पहचान
शिबू सोरेन को राजनीतिक पहचान संथाल परगना क्षेत्र से मिली, जहां वे आदिवासी समाज के सर्वमान्य नेता बने और दिशोम गुरु कहलाए। लगभग चार दशकों तक वे झारखंड और देश की राजनीति में सक्रिय रहे। समाजसेवी और आंदोलनकारी के रूप में शुरू हुआ उनका सफर विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री तक पहुंचा। उन्होंने झारखंड के अलग राज्य आंदोलन को जनआंदोलन का रूप दिया और आदिवासी अस्मिता को राजनीतिक मंच प्रदान किया।
Tribal Leader of Jharkhand:मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में योगदान
दिशोम गुरु शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2005, 2008 और 2009 में उन्होंने राज्य की कमान संभाली। वे दुमका संसदीय क्षेत्र से आठ बार सांसद चुने गए और राज्यसभा के सदस्य भी रहे। केंद्र सरकार में वे तीन बार मंत्री रहे। ग्राम पंचायत से लेकर देश की संसद तक उन्होंने आदिवासी, गरीब और वंचित वर्गों की आवाज को मजबूती से उठाया। वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका संघर्ष और विचार आज भी झारखंड की राजनीति को दिशा देते हैं।
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