Bihar Jeevika Women Success Story: बिहार के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली हज़ारों महिलाओं के लिए सिलाई और कढ़ाई का काम अब सिर्फ़ पारंपरिक हुनर नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का एक मज़बूत ज़रिया बन गया है। ग्रामीण विकास विभाग के तहत काम करने वाली ‘बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति’ (जीविका) ने ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ (NRLM) के साथ मिलकर इस हुनर को संगठित रोज़गार और उद्यमिता से जोड़ा है। नतीजतन, राज्य भर में 50,000 से ज़्यादा महिलाएँ अब सिलाई के ज़रिए नियमित कमाई कर रही हैं और अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति को मज़बूत बना रही हैं।
2023 में ‘जानकी जीविका महिला सिलाई प्रोड्यूसर कंपनी’ का गठन
महिलाओं के सिलाई के काम को औपचारिक और संगठित रूप देने के लिए 2023 में ‘जानकी जीविका महिला सिलाई प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड’ की स्थापना की गई। इस कंपनी के ज़रिए, जीविका से जुड़ी महिलाओं को बड़े पैमाने पर उत्पादन, मार्केटिंग के मौके और सरकारी संस्थानों से काम के ऑर्डर मिलने लगे। इससे ग्रामीण महिलाओं को अपने ही गाँव या आस-पास के इलाकों में रोज़गार के अवसर मिले, जिससे शहरों की ओर पलायन की ज़रूरत कम हुई।
₹149.7 करोड़ का टर्नओवर; 68 लाख से ज़्यादा कपड़ों का उत्पादन
जीविका की सिलाई पहल ने आर्थिक रूप से शानदार सफलता हासिल की है। अलग-अलग सरकारी विभागों के सहयोग से, महिलाओं ने अब तक 6,877,557 कपड़ों का उत्पादन किया है। इनमें मुख्य रूप से छात्रों के लिए स्कूल यूनिफ़ॉर्म और अस्पताल के मरीज़ों के लिए ज़रूरी कपड़े शामिल हैं। इस पहल से ₹149.7 करोड़ का बिज़नेस टर्नओवर हुआ है, जो ग्रामीण महिलाओं की उद्यमिता के लिए एक बड़ी कामयाबी है।
15 ज़िलों में आधुनिक ट्रेनिंग सेंटर; 45,000 से ज़्यादा मशीनें
बेहतर ट्रेनिंग और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादन को सुनिश्चित करने के लिए, राज्य के 15 ज़िलों में ‘नोडल सिलाई-सह-प्रशिक्षण केंद्र’ (Nodal Tailoring-cum-Training Centers) स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों पर ट्रेनिंग और उत्पादन दोनों काम हो रहे हैं, जिनमें 1,365 आधुनिक सिलाई मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा, इस प्रोग्राम को बाकी 23 ज़िलों तक बढ़ाते हुए, हर ब्लॉक में कम से कम दो क्लस्टर लेवल फेडरेशन (CLF) में सिलाई और कपड़ा काटने (फैब्रिक-कटिंग) के केंद्र स्थापित किए गए हैं। अभी, ‘जीविका दीदियाँ’ क्लस्टर, ग्राम संगठन और प्रोड्यूसर ग्रुप के लेवल पर 45,000 से ज़्यादा सिलाई मशीनों का इस्तेमाल करके कपड़े बनाने का काम कर रही हैं।
महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए एक नया बेंचमार्क
जीविका की यह पहल सिर्फ़ रोज़गार देने तक ही सीमित नहीं है; यह ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो रही है। नियमित आमदनी होने से इन महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी बढ़ी है। अपने परिवारों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के अलावा, वे अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, सेहत और दूसरी ज़रूरी चीज़ों के खर्चों में भी योगदान दे रही हैं। सरकारी विभागों से लगातार मिलने वाले काम के ऑर्डर महिलाओं को पक्का रोज़गार दे रहे हैं। इससे न सिर्फ़ कम्युनिटी एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा मिलता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मज़बूत होती है। जीविका मॉडल बिहार में महिला सशक्तिकरण और स्वरोज़गार के एक सफल उदाहरण के तौर पर उभरा है।
यह भी पढ़ें: Jharkhand Bus Permit Crisis: 200 से अधिक बसों का Renewal अटका, आंदोलन की चेतावनी
Highlights



















