Vintage Bentley Cars in Jharkhand: जब सड़क पर दौड़ा इतिहास! 1926 और 1927 की बेंटले कारों को देखने उमड़ी लोगों की उत्सुकता

Vintage Bentley Cars in Jharkhand: कभी-कभी सड़क पर गुजरती कोई गाड़ी केवल एक वाहन नहीं होती, बल्कि अपने साथ इतिहास का पूरा दौर लेकर चलती है। जब ऐसी गाड़ी की गहरी, गुर्राहट भरी आवाज सुनाई देती है, तो ऐसा लगता है मानो सड़क पर इतिहास को अपनी आंखों के सामने गुजरते देख रहे हों। मंगलवार को रांची-रामगढ़ रोड पर कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जब करीब 100 साल पुरानी दो विंटेज बेंटले कारें सड़क से गुजरीं। 1926 और 1927 में बनी ये कारें अपनी बनावट, दमदार इंजन और ऐतिहासिक पहचान के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। इन कारों को लेकर विश्व यात्रा पर निकले ब्रिटेन के रॉबर्ट विल्किंसन और जॉन वाल्टन भारत की सड़कों पर इतिहास को जीवंत कर रहे हैं। आधुनिक कारों और इलेक्ट्रिक वाहनों के दौर में इन पुरानी कारों की मौजूदगी अपने आप में खास अनुभव है।

रांची-रामगढ़ रोड पर दिखा विंटेज कारों का अनोखा नजारा

मंगलवार को दोपहर करीब 12 बजे रांची-रामगढ़ रोड पर गुजरती इन कारों ने लोगों का ध्यान खींचा। बेंटले के इंजन की गहरी आवाज और इसकी पारंपरिक बनावट ने सड़क पर एक अलग ही माहौल बना दिया। इन कारों को देखकर ऐसा महसूस होता है कि मानो मोटरगाड़ियों के शुरुआती दौर का कोई हिस्सा वर्तमान समय में लौट आया हो। इनकी लंबी बोनट, क्लासिक डिजाइन और विशाल स्टीयरिंग आधुनिक कारों से बिल्कुल अलग अनुभव देते हैं। विंटेज कारों के प्रति दुनिया भर में आकर्षण है, लेकिन करीब एक सदी पुरानी कारों को लंबी अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर चलाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण और रोमांचक काम है।

1926 और 1927 की बेंटले लेकर विश्व यात्रा पर निकले जॉन और रॉबर्ट

ब्रिटेन के लीसेस्टर निवासी 63 वर्षीय रॉबर्ट विल्किंसन और 72 वर्षीय जॉन वाल्टन इन ऐतिहासिक कारों के साथ कई देशों की सड़कों पर सफर कर चुके हैं। दोनों का ऑटोमोबाइल उद्योग से जुड़ा अनुभव रहा है। कभी वे आयातित कारों के कारोबार में एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी थे, लेकिन काम के बाहर उनकी दोस्ती ने उन्हें यात्रा का साथी बना दिया। रॉबर्ट के लिए बेंटले केवल एक कार नहीं, बल्कि परिवार से जुड़ी यादों और जीवन के अनुभवों का हिस्सा है। उनके अनुसार, उनके दादा ऐसे व्यक्ति के यहां काम करते थे, जिनके पास बेंटले कार थी। उस दौर में यह कार इतनी महंगी थी कि आम लोगों के लिए इसे खरीदना आसान नहीं था। रॉबर्ट की 1926 मॉडल बेंटले में 6.5 लीटर का इंजन है, जो करीब 160 बीएचपी की ताकत पैदा करता है। उनके मुताबिक, कार लगभग 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है और आरामदायक सफर का अनुभव देती है।

मुंबई से शुरू हुआ भारत का सफर, केरल के बाद झारखंड तक पहुंचीं कारें

विश्व यात्रा के भारतीय चरण में दोनों यात्री 4 फरवरी को मुंबई पहुंचे थे। इसके बाद कारों को शिपिंग के माध्यम से भारत लाया गया और उन्होंने दक्षिण भारत की ओर सड़क यात्रा शुरू की। गोवा, कर्नाटक और केरल से गुजरते हुए दोनों वायनाड और कोझिकोड में भी ठहरे। इसके बाद वे कोच्चि पहुंचे। कोच्चि में इन कारों की मौजूदगी ने लोगों का ध्यान खींचा। नारियल के पेड़ों और बैकवॉटर के बीच इन ऐतिहासिक वाहनों का सफर किसी पुराने दौर की तस्वीर जैसा नजर आया। इसी यात्रा के दौरान झारखंड की सड़कों पर भी इन कारों को देखने का मौका मिला। रांची-रामगढ़ रोड पर जॉन ने बताया कि 1926 मॉडल की इस विंटेज कार को भारत में छह महीने तक चलाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। उनके साथ मुंबई निवासी डेनियल स्थानीय गाइड के रूप में जुड़े हैं। डेनियल यात्रा के दौरान रास्तों और स्थानीय व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं। जॉन ने अपने मोबाइल फोन पर कार की रेस ट्रैक पर मौजूदगी की तस्वीरें भी दिखाईं। भारत में मिल रहे स्वागत और लोगों के स्नेह से वे काफी प्रभावित नजर आए।

पेट्रोल की अधिक खपत, साथ चलती है स्पेयर पार्ट्स से भरी लैंड क्रूजर

करीब 100 साल पुरानी कारों को लंबी दूरी तक चलाना आसान नहीं है। इनके रखरखाव, ईंधन और मरम्मत की व्यवस्था यात्रा का अहम हिस्सा है। रॉबर्ट की बेंटले लगभग तीन किलोमीटर चलने में एक लीटर पेट्रोल खर्च करती है। इसी वजह से दोनों कारों के साथ एक टोयोटा लैंड क्रूजर भी चलती है, जिसे रॉबर्ट ने केपटाउन में खरीदा था। यह लैंड क्रूजर यात्रा के दौरान चलती-फिरती सप्लाई यूनिट की तरह काम करती है। इसमें अतिरिक्त पेट्रोल टैंक के अलावा एग्जॉस्ट गैस्केट, केबल, ब्रेक पैड, फिल्टर और स्पार्क प्लग जैसे जरूरी स्पेयर पार्ट्स रखे जाते हैं। डेनियल इस वाहन को चलाते हैं और स्थानीय स्तर पर यात्रा संबंधी सहायता भी करते हैं। जॉन के मुताबिक, जिस देश में वे जाते हैं, वहां स्थानीय लोगों की मदद से यात्रा को आगे बढ़ाया जाता है। अब तक कारों में कुछ तकनीकी समस्याएं भी आई हैं। जॉन की बेंटले को एक बार राजमार्ग पर परेशानी होने के बाद ब्रिटेन से जरूरी पुर्जे मंगवाने पड़े थे। हालांकि, रॉबर्ट के अनुसार, यात्रा के दौरान अब तक केवल दो बार खराबी आई और दोनों बार समस्या का समाधान कर लिया गया।

दुनिया के कई देशों की सड़कें नाप चुकी हैं ऐतिहासिक बेंटले

रॉबर्ट की विश्व यात्रा की शुरुआत उस समय हुई, जब वे 50 वर्ष के थे। उन्होंने अपनी बेंटले को न्यूयॉर्क भेजा था और शुरुआत में इसे कुछ समय के लिए दुनिया घूमने की योजना माना था। लेकिन यह सफर एक अस्थायी यात्रा से आगे बढ़कर उनकी जीवनशैली का हिस्सा बन गया। इन कारों ने अमेरिका के लास वेगास से लेकर अलास्का के ठंडे इलाकों तक का सफर किया है। दोनों ने एंडीज पर्वतमाला, अटाकामा रेगिस्तान और बोलीविया के नमक के मैदानों में भी यात्रा की। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, म्यांमार, चीन और मंगोलिया जैसे देशों में भी इनका सफर जारी रहा है। रॉबर्ट का कहना है कि जीवन का असली आनंद यादें बनाने, लोगों से मिलने और अलग-अलग जगहों की वास्तविक जिंदगी को समझने में है। उनके लिए बेंटले अब सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि उन अनुभवों का प्रतीक बन चुकी है, जिन्हें उन्होंने वर्षों की यात्रा में हासिल किया है।

भारत की संस्कृति और स्थानीय जीवन को करीब से देख रहे हैं दोनों यात्री

दोनों पर्यटक केवल ऐतिहासिक इमारतों और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं रहते। वे स्थानीय जीवन, कामकाज और संस्कृति को भी करीब से समझने की कोशिश करते हैं। केरल में उन्होंने चाय और कॉफी के बागानों का दौरा किया तथा उत्पादन की प्रक्रिया को देखा। पारंपरिक छत की टाइलें बनाने के काम में भी उनकी रुचि रही। कर्नाटक के कबिनी क्षेत्र में रॉबर्ट अदरक के खेत तक पहुंचे और वहां काम करने वाले लोगों के साथ श्रम का अनुभव भी किया। डेनियल के अनुसार, रॉबर्ट ने खेत में केवल तस्वीरें लेने के बजाय अदरक से भरी करीब 25 किलोग्राम की पेटी उठाकर ट्रक पर रखने में भी मदद की। यह अनुभव उनके लिए भारत के ग्रामीण जीवन को समझने का एक अलग तरीका था। जॉन ने केरल के माहौल, सड़कों और लोगों के व्यवहार की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि यहां का वातावरण अपेक्षाकृत शांत है और लोग पुरानी बेंटले को देखकर सम्मान के साथ रास्ता देते हैं। स्थानीय संस्कृति, खानपान और आतिथ्य ने भी दोनों यात्रियों को प्रभावित किया है।

पुरानी बेंटले का रखरखाव बन रहा चुनौती, आगे श्रीलंका जाने की योजना

रॉबर्ट के मुताबिक, समय के साथ पुरानी बेंटले कारों की मांग में बदलाव आया है। उनके अनुसार, अब 1968 की पोर्श और 1972 की फेरारी जैसी कारों में लोगों की रुचि अधिक दिखाई देती है, जबकि पुरानी बेंटले की मांग पहले की तुलना में कम हुई है। इन कारों को संभालने में एक बड़ी समस्या कुशल मैकेनिकों की कमी भी है। रॉबर्ट का कहना है कि ब्रिटेन में उनके पास एक ऐसे विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने खुद सीखकर बेंटले स्पीड सिक्स के इंजन की बारीकियों को समझा है। लेकिन ऐसे अनुभवी मैकेनिकों के सेवानिवृत्त होने के बाद भविष्य में इन कारों की मरम्मत कराना कठिन हो सकता है। केरल की यात्रा पूरी करने के बाद दोनों की योजना 24 फरवरी तक तिरुवनंतपुरम पहुंचने और वहां से कारों को श्रीलंका भेजने की थी। श्रीलंका की यात्रा के बाद वे भारत लौटकर देश के अन्य हिस्सों का सफर करने की योजना बना रहे थे। करीब 12 महीने और सड़क पर बिताने की योजना के साथ जॉन और रॉबर्ट की यह यात्रा दिखाती है कि जुनून की कोई उम्र नहीं होती। रांची-रामगढ़ रोड पर इन बेंटले कारों को देखना भी इसी अनुभव का हिस्सा रहा—जहां कुछ देर के लिए सड़क पर केवल दो गाड़ियां नहीं, बल्कि बीते दौर का इतिहास गुजरता हुआ महसूस हुआ।

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