Bihar Thermocol Waste Recycling: बिहार में कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की पहल के तहत पटना जिले के खुशरूपुर प्रखंड की अलावलपुर पंचायत में थर्मोकोल अपशिष्ट के पुनर्चक्रण का मॉडल विकसित किया गया है। यहां थर्मोकोल कचरे से दाने तैयार किए जा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल दोबारा थर्मोकोल शीट बनाने में होता है। ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार, इस इकाई में हर महीने करीब 40 से 50 टन थर्मोकोल दानों का उत्पादन हो रहा है। इससे एक ओर अपशिष्ट के निस्तारण में मदद मिल रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी तैयार हुए हैं।
लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान की पहल से शुरू हुआ मॉडल
इस पहल को ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (LSBA) और स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के उद्देश्यों से जोड़ा गया है। इन अभियानों का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता को बढ़ावा देने के साथ ठोस एवं तरल अपशिष्ट का बेहतर प्रबंधन करना है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, थर्मोकोल हल्का होने और अधिक जगह घेरने के कारण इसके भंडारण तथा निस्तारण में परेशानी होती थी। इसके खरीदार भी आसानी से नहीं मिलते थे। इस समस्या के समाधान के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की प्रखंड क्रियान्वयन समिति ने स्थानीय कबाड़ व्यवसायी ब्रदर प्लास्टिक्स को थर्मोकोल के संग्रहण और पुनर्चक्रण के लिए प्रेरित किया।
2017 से शुरू हुआ काम, 2023 में आधुनिक मशीनों से उत्पादन
ब्रदर प्लास्टिक्स के संचालक दीपक कुमार ने वर्ष 2017 में कचरा केंद्रों से थर्मोकोल खरीदकर उससे लम्प्स तैयार करने का काम शुरू किया। बाद में तकनीक में सुधार किया गया और वर्ष 2023 से आधुनिक मशीनों की मदद से थर्मोकोल के लम्प्स से सीधे दाने यानी ग्रैन्यूल्स तैयार किए जाने लगे। वर्तमान में यह इकाई पटना के आठ, रांची के दो और बनारस के एक कबाड़ व्यवसायी से थर्मोकोल अपशिष्ट खरीदती है। इससे पुनर्चक्रण के लिए कच्चे माल की आपूर्ति बिहार से बाहर के बाजारों से भी हो रही है।

मशीनों से कचरे को दानों में बदलने की प्रक्रिया
इकाई के संचालक दीपक कुमार के अनुसार, सबसे पहले थर्मोकोल अपशिष्ट को छोटे टुकड़ों में तोड़कर पिघलाया जाता है। इससे ठोस लम्प्स तैयार होते हैं। इसके बाद ग्राइंडिंग मशीन से इन्हें पाउडर में बदला जाता है और जरूरत के अनुसार रसायन मिलाए जाते हैं। फिर एक्सट्रूडर मशीन की मदद से सामग्री को मोटे रेशों के रूप में तैयार किया जाता है। अंत में इन्हें छोटे-छोटे दानों में काट लिया जाता है। इन दानों का उपयोग नई थर्मोकोल शीट और अन्य संबंधित उत्पाद बनाने में किया जाता है।

17.50 लाख रुपये के मासिक उत्पादन मूल्य का अनुमान, 12 लोगों को रोजगार
विभागीय जानकारी के अनुसार, इकाई में हर महीने करीब 40 से 50 टन थर्मोकोल दानों का उत्पादन होता है। औसतन 35,000 रुपये प्रति टन की दर के आधार पर 50 टन उत्पादन का बाजार मूल्य लगभग 17.50 लाख रुपये बैठता है। यह उत्पादन की मात्रा और बताई गई औसत दर पर आधारित अनुमान है, वास्तविक लाभ नहीं। इस इकाई में स्थानीय स्तर पर 12 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है। विभाग के अनुसार, अलावलपुर का यह उदाहरण दिखाता है कि संग्रहण, पुनर्चक्रण और बाजार की व्यवस्था के जरिए कचरे को उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है।

मंत्री श्रवण कुमार ने बताया वेस्ट टू वेल्थ की दिशा में पहल
ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में कई काम किए जा रहे हैं। उनके अनुसार, प्लास्टिक कचरे से पेवर ब्लॉक, सजावटी सामग्री, गमले, खिलौने और इंटरलॉकिंग टाइल्स बनाने के साथ सड़क निर्माण में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। मंत्री ने कहा कि थर्मोकोल अपशिष्ट से दाने तैयार कर पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनके मुताबिक, विभाग और उद्यमों के समन्वित प्रयासों से बिहार कचरे को संसाधन और संपदा में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने इन पहलों को वेस्ट टू वेल्थ और सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा से जोड़ते हुए अपशिष्ट प्रबंधन में नवाचार के महत्व पर जोर दिया।



















