43 साल ‘नदिया के पार’ का विशेष प्रदर्शन, युवाओं को बिहार की सांस्कृति परंपराओं और सामाजिक जीवन की मिलेगी झलक

 43 साल ‘नदिया के पार’ का विशेष प्रदर्शन, युवाओं को बिहार की सांस्कृति परंपराओं और सामाजिक जीवन की मिलेगी झलक

पटना, 18 दिसंबर : बिहार के युवाओं को राज्य की पारंपरिक संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से रूबरू कराने के उद्देश्य से वर्ष 1982 की बहुचर्चित फिल्म ‘नदिया के पार’ का विशेष प्रदर्शन किया जाएगा। यह आयोजन बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के अंतर्गत बिहार राज्य फिल्म विकास एवं वित्त निगम लिमिटेड द्वारा आयोजित किया जा रहा है।

बिहार की संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन की मिलेगी झलक

फिल्म विकास निगम लिमिटेड के अधिकारी अरविंद रंजन दास ने बताया कि निगम द्वारा संचालित “कॉफी विद फिल्म” कार्यक्रम के तहत प्रत्येक सप्ताह बिहार की संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन पर आधारित फिल्मों का नियमित प्रदर्शन और परिचर्चा आयोजित की जाती है। इसी क्रम में इस बार लोकप्रिय सामाजिक-संगीतात्मक फिल्म ‘नदिया के पार’ को हाउस ऑफ वेराइटी, रीजेंट सिनेमा कैंपस, गांधी मैदान, पटना में प्रदर्शित किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि राजश्री प्रोडक्शंस के बैनर तले वर्ष 1982 में निर्मित इस फिल्म के निर्देशक गोविंद मुनीस एवं निर्माता ताराचंद बड़जात्या हैं। स्वर्गीय रविंद्र जैन द्वारा रचित कर्णप्रिय गीतों ने इस फिल्म को कालजयी पहचान दिलाई है। विशेष रूप से “कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया” गीत आज भी युवाओं और नई पीढ़ी में समान रूप से लोकप्रिय है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार होंगे, जबकि कार्यक्रम की निवेदिका बिहार राज्य फिल्म विकास एवं वित्त निगम लिमिटेड की महाप्रबंधक रूबी होंगी।

बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में का भी होगा प्रसारण

फिल्म प्रदर्शन के साथ-साथ “बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में: अपनी जड़ों से जुड़ाव” विषय पर परिचर्चा का भी आयोजन किया गया है। इसमें नगर के कला, साहित्य, संगीत एवं सिनेमा जगत से जुड़े गणमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया है।

लोक-संगीत की सौंधी खुशबू के साथ ही भोजपुरी भाषा-संस्कृति की सकारात्मक छवि की होगी प्रस्तुति

उल्लेखनीय है कि फिल्म ‘नदिया के पार’ प्रसिद्ध लेखक केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ पर आधारित है। यह फिल्म भोजपुरी भाषा की मौलिक पहचान, सादगीपूर्ण कथानक और पारंपरिक सामाजिक संरचना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। संवादों की आडंबरहीन शैली और लोक-संगीत की सौंधी खुशबू के साथ यह फिल्म आज की पीढ़ी के बीच भोजपुरी भाषा और संस्कृति की सकारात्मक छवि प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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