साल भर का इंतजार.. अब ईख काटकर बेटी की शादी करेंगे इस गांव के किसान, अच्छी फसल होने से खिले चेहरे

गयाजी : बिहार के गयाजी का बैजू धाम लकड़ाही के किसानों का साल भर का इंतजार खत्म हुआ। उनके चेहरे खिले हैं। क्योंकि उन्होंने ईख की फसल जो लगाई थी वह अच्छी हुई है। इस सालाना फसल का लंबे समय तक इंतजार करने के बाद अब किसान ईख की कटाई और गुड़ बनाने में जुट गए हैं। उनकी मेहनत इन दिनों बढ़ी हुई है क्योंकि उन्हें ईख की कमाई से अपनी बिटिया की शादी जो करनी है।

गयाजी का एक सुदूरवर्ती इलाका बैजू धाम लकड़ाही है

गयाजी का एक सुदूरवर्ती इलाका बैजू धाम लकड़ाही है। यह गांव गुरुआ प्रखंड अंतर्गत पड़ता है। इस गांव के किसानों के चेहरे खिले हुए हैं। किसानों के चेहरे इसलिए खिले हुए हैं, क्योंकि इस बार गन्ने की खेती काफी अच्छी हुई है। एक साल का लंबा इंतजार करने के बाद यह मौका आया है कि अब इससे कमाई कर रहे हैं। इस कमाई से कई बड़े काम निपटाएंगे, जिसमें बिटिया की शादी भी होती है। अपनी बेटी की शादी के लिए इस क्षेत्र के सैकड़ों किसान ईख की खेती पर निर्भर रहते हैं। यदि ईख की खेती अच्छी हुई तब तो ठीक बुरी हुई तो बिटिया की शादी तक रूक जाती है। इस दफा सैंकड़ों एकड़ में लगी सैकड़ों किसानों की ईख की फसल काफी अच्छी हुई है, जिससे उनमें काफी उत्साह है।

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माघ फाल्गुन के महीने में इसकी कटाई होती है और इन दिनों सैकड़ों ईख की कटाई में जुटे हुए हैं

माघ फाल्गुन के महीने में इसकी कटाई होती है और इन दिनों सैकड़ों ईख की कटाई में जुटे हुए हैं। बैजू धाम लकड़ाही गांव के सुरेश यादव की उम्र 60 साल की हो चुकी है। सुरेश यादव सुबह से ही ईख की कटाई में जुटे हुए हैं। इस उम्र में भी उनके हाथ तेजी से चल रहे। ईख काटकर अपने सर पर रखकर उसे एक जगह पर ले जा रहे चारों ओर ईख के डंठल पड़े हैं। ईख भी बेची जा रही है और उससे गुड़ भी बनाने में जुटे हुए हैं। सुबह से ही सुरेश यादव काफी मेहनत कर रहे हैं। उनकी मेहनत में कई भाव छुपे हुए हैं। इस बार सुरेश यादव को अपनी बेटी की शादी करनी है। इसलिए अच्छी फसल ने उनके चेहरे पर मुस्कान बढ़ा दी है। इस बार बिटिया की शादी होगी। खुशी का माहौल होगा, यह सोचकर भी वे तेजी से ईख काट रहे हैं।

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पिछले साल माघ के महीने में ईख की फसल लगाई थी

पिछले साल माघ के महीने में ईख की फसल लगाई थी। कई कट्ठे में ईख की फसल इन्होंने लगाई थी। इस बार अच्छी फसल हुई है। कई काम निपटाने हैं, जिसमें अपनी बेटी की भी शादी का काम है। ईख ही फसल काटकर और उसे बेचकर पैसे जमा कर रहा हूं। ईख से गुड़ भी बना लेता हूं। लाखों की कमाई हो जाएगी। बिटिया की शादी में कोई दिक्कत नहीं होगी। यह फसल सालाना है। साल में उपजती है। पूरे एक साल की खेती है। जब फसल लगती है उसके बाद से इंतजार करते हैं। अब समय आ गया है कि माघ फाल्गुन के महीने में कटाई कर अपनी बिटिया की शादी के लिए दो पैसे इकट्ठे कर सके और उसकी शादी कर सके। वैशाख में अपनी बेटी की शादी करूंगा।

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ईख की खेती को माघ महीने में रोपते हैं – दीनानाथ यादव

वही, दीनानाथ यादव बताते हैं कि ईख की खेती को माघ महीने में रोपते हैं। एक साल इंतजार करते हैं। पूरे 12 महीने में यह फसल तैयार होती है। माघ में रोपते हैं और माघ फाल्गुन में से ही इसकी कटाई करते हैं। अभी माघ और फागुन के महीने में कटाई लगातार चल रही है। आने वाले महीने में अपनी बेटी की शादी करेंगे। ईख की जब अच्छी उपजती है तो एक नया उमंग होता है। इस बार काफी ऐसी फसल हुई है। हमें खुशी है कि हमारी बेटी की भी शादी होगी और बेटे की पढ़ाई भी की फीस में भी दिक्कत नहीं होगी।

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‘एक साल का इंतजार किया, अब ईख की कटाई की बारी आई है’

आपको बता दें कि एक साल का इंतजार किया, अब ईख की कटाई की बारी आई है। हमने माघ के महीने में एक बीघे में ईख की खेती लगाई थी। इस बार काफी अच्छी फसल हुई है। हमलोग के चेहरे पर खुशी है। क्योंकि यह नकदी माल है। यदि जरा सी फसल भी मरती है तो आफत है। हम लोग का साल भर प्रभावित हो जाता है। कई बड़े काम रूक जाते हैं। शादी विवाह, पढ़ाई लिखाई घर का खर्चा सब में बाधा आने लगती है। किंतु इस बार एक बीघे में जो हमने ईख की खेती लगाई थी तो अच्छी फसल आई है और इस बार सारे काम निपटा लेंगे।

क्योंकि पूरा साल ईख की कमाई पर ही निर्भर होता है

क्योंकि पूरा साल ईख की कमाई पर ही निर्भर होता है। इसकी कटाई कर हमलोग साल भर का भविष्य तय कर लेते हैं। हमें अपनी बेटी की शादी करनी है। घर में शहनाई तभी बाजेगी, जब ईख बेचकर पैसे जुटाएंगे। इसी को लेकर हम लोग ईख की कटाई में जुटे हुए हैं। वहीं हमलोग गुड का भी निर्माण कर लेते हैं, जिससे और भी अच्छी कमाई हो जाती है। इसकी कमाई से अपने बेटे नीतीश के पढ़ाई की फीस की व्यवस्था एक तरह से हो गई है। बैजू धाम लकड़ाही गांव में सैकड़ों सालों से पुश्त दर पुश्त ईख की खेती हो रही है। ईख की खेती से यहां के किसानों के चेहरे तकरीबन हर साल खिल जाते हैं। ईख की खेती सालाना फसल है।

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साल भर का इंतजार करना एक बड़ी बात है, इसके लिए काफी धैर्य रखना पड़ता है

साल भर का इंतजार करना एक बड़ी बात है, इसके लिए काफी धैर्य रखना पड़ता है। किंतु इसके बीच इलाके के धैर्यवान किसान एक-एक दिन काटकर साल भर का इंतजार करते हैं और अपनी बोई ईख की फसल काटते हैं। ईख जितनी ज्यादा उपजती है, उतनी ज्यादा मुस्कान यहां के किसानों के चेहरे पर खिलती है। यहां के किसान बताते हैं कि 400- 500 सालों से भी अधिक समय से इसकी खेती हो रही है। हमलोग कोई छठी पीढ़ी, कोई पांचवीं पीढ़ी, कोई सातवीं पीढ़ी का है, जो पुश्त दर पुश्त ईख की खेती कर रहे हैं। बैजूधाम लकड़ाही गांव को ईख से बड़ी पहचान है। इसे ईख वाला गांव के नाम से जाना जाता है। ईख वाला गांव किसी को भी कहे, तो वह बैजू धाम लकड़ाही के बारे में बता देते हैं। इस तरह से यहां सैकड़ों की संख्या में किसान सैकड़ों सालों से ईख की खेती कर रहे हैं। ईख की खेती ने इस गांव की समृद्धि को बरकरार रखा है।

100 से भी अधिक किसान आज भी सैकड़ों एकड़ में ईख की खेती कर रहे हैं – गांव के किसान

गांव के किसान बताते हैं कि 100 से भी अधिक किसान आज भी सैकड़ों एकड़ में ईख की खेती कर रहे हैं। पूरे गांव में चारों ओर ईख की फसल लहलहा रही है। चावल गेहूं की अपेक्षा ईख ही फसल ज्यादा आमदनी देती है। नकदी फसल है। नकदी रुपए मिल जाते हैं। वही, इस गांव के किसान बताते हैं कि ईख की खेती में हमारी मेहनत पर हमारी कमाई निर्भर करती है। क्योंकि यदि हम सिर्फ ईख बेच दे तो उतनी कमाई नहीं होगी। हमलोग इससे गुड का निर्माण भी कर लेते हैं, जिससे कमाई और भी बढ़ जाती है।

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यदि ठीक तरीके से मेहनत कर दिया जाए तो एक कट्ठा में कम से कम 10 हजार बच जाते हैं

किसान बताते हैं, कि यदि ठीक तरीके से मेहनत कर दिया जाए तो एक कट्ठा में कम से कम 10 हजार बच जाते हैं। यदि एक एकड़ में खेती हो तो तीन से चार लाख रुपए की आमदनी जरूर हो जाती है। साल में यदि चार लाख रुपए कमाते हैं तो वह औसतन महीने का 35 हजार हो जाते हैं। इतने पैसे की कमाई ठोस तौर पर हो जाती है इसके अलावे ईख सालाना फसल है और ज्यादा इसमें मेहनत नहीं है। एक बार जुताई और फिर तीन-चार पानी ही इसमें देना पड़ता है। इससे फायदा यह होता है कि और भी कई काम जो है, वह इसके साइड में कर सकते हैं। यानी कि साल भर में यदि सिर्फ दो महीने की मेहनत ईख पर की जाए तो उसकी फसल पूरी तरह से अच्छी निकलती है। इसके बाद जो शेष 10 महीने का समय बच जाता है तो उसमें वह दूसरा काम भी कर लेते हैं। इससे साइड का इनकम हो जाता है और यही वजह है कि सालाना फसल लगाने में यहां के किसान काफी दिलचस्पी रखते हैं। ईख की खेती जो सालाना फसल है, उसे पीढ़ियों से यहां के किसान करते आ रहे हैं।

किसान बताते हैं कि माघ में वे ईख की फसल लगाते हैं

किसान बताते हैं कि माघ में वे ईख की फसल लगाते हैं। एक साल का इंतजार करते हैं। माघ फाल्गुन में इसकी कटाई करना शुरू कर देते हैं। यहां के दर्जनों किसानों ने मशीन लगा रखी है, जिससे ईख की पेराई करते हैं। वहीं बड़े-बड़े चूल्हे पर ईख के रस को उबला जा रहा है इसे उबालकर गुड तैयार करते हैं। आज गुड़ की कीमत काफी है। आज शुद्ध गुड़ डेढ़ सौ रुपए प्रति किलो तक बिकता है। यदि किसानों की माने तो कम खर्चे में उपज कर महंगा गुड़ हम लोग बना लेते हैं। ईख की उपज कर महंगा गुड़ बिकता है। हमलोग इसे हर वर्ष तैयार कर लेते हैं और अच्छी आमदनी हो जाती है। एक कट्ठा में कम से कम 10 हजार की कमाई कोई नहीं रोक सकता है। यही वजह है कि गांव के दर्जनों किसानों के द्वारा गुड़ का भी निर्माण किया जा रहा है। वहीं, किसान बिट्टू कुमार बताते हैं कि गन्ना की खेती पूर्वजों से हो रही है। सैकड़ों किसान जुड़े हैं। गन्ने की खेती से पुश्त दर पुश्त जीवन यापन चल रहा है। हमने आठ से 10 बीघा में खेती लगाया है। लाखों की कमाई होती है। गन्ना बेचकर जमीन ले लिए हैं। इसी से घर में शादी विवाह आदि भी शुभ कार्य हो रहे हैं।

हमारे यहां का गुड़ बंगाल, नेपाल, यूपी तक जाता है – किसान

पीढ़ी दर पीढ़ी सैकड़ों सालों से यह काम चल रहा है। यहां का गुड़ यूपी, बंगाल और नेपाल तक जाता है। हमारे यहां गांव में गन्ने की खेती पूर्वजों के काल से हो रही है। आज भी सैकड़ों किसान इससे जुड़े हैं। सैंकड़ों एकड़ में इसकी खेती लगाई गई है। मैं आठ से 10 बीघा में ईख की खेती लगाया हूं। इस बार गन्ने की खेती से मैं लाखों रुपए कमा लूंगा। इतने बड़े पैमाने पर हमने खेती लगाई है तो उसका फायदा भी काफी है। हम लोग ईख से गुड़ भी बना लेते हैं जिससे आमदनी मुंह मांगी होती है। यहां गुड़ की खरीददारी करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। व्यापारी भी काफी दूर से आते हैं। यहां हम लोगों ने गन्ना बेचकर जमीन ले लिया। घर में शादी का शुभ कार्य भी साल भर के इंतजार के बाद ईख की कमाई से करते हैं। हमारे यहां का गुड़ बंगाल, नेपाल, यूपी तक जाता है।

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ईख की खेती से ही हम लोग जीवित है, हमलोग पलायन नहीं करते हैं – किसान

किसान ने कहा कि ईख की खेती से ही हमलोग जीवित हैं, हमलोग पलायन नहीं करते हैं। क्योंकि हमारे पास एक दो माह का नहीं बल्कि सालाना रोजगार है। हमारे यहां 100 से अधिक एकड़ में ईख की खेती सैंकड़ों किसान कर रहे हैं। किसी ने कई कट्ठे तो किसी ने एकड़ में खेती लगाई। 1966 से इसकी खेती कर रहा हूं, थोड़ी मेहनत है। देखरेख करनी पड़ती है। इसकी मिठास से हम लोग खुशहाल हैं। इस बार काफी अच्छी फसल हुई है। हमारे गांव के भुनेश्वर यादव के बेटे सुनील की नौकरी भी ईख की खेती के पैसों से संभव हो पाई है। इस तरह इस गांव की तस्वीर और तकदीर ईख की खेती बदल रही है। ईख की मिठास से यहां का हर किसान समृद्ध हो रहा है। इस बार हमने खेती लगाई है, तो लाखों रुपए की आमदनी का अनुमान है।

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आशीष कुमार की रिपोर्ट

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