Bihar NSD Campus: बिहार की सांस्कृतिक पहचान उसकी लोकपरंपराओं, लोकगीतों, कथाओं और जीवंत सामाजिक अभिव्यक्तियों से निर्मित हुई है। यहाँ कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं रही, बल्कि समाज के अनुभवों, संघर्षों और संवेदनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी बनी है। गाँव की चौपालों से लेकर पर्व-त्योहारों तक और लोकगीतों से लेकर लोकनाट्य तक, बिहार की सांस्कृतिक यात्रा में रंगमंच की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज बिहार के रंगमंच के सामने परंपरा को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसे आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और नए प्रयोगों से जोड़ने की चुनौती भी है। ऐसे समय में राज्य में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी एनएसडी के नए परिसर की स्थापना की घोषणा को सांस्कृतिक क्षेत्र में संभावनाओं से भरे कदम के रूप में देखा जा रहा है।
लोकपरंपराओं से समृद्ध रहा है बिहार का रंगमंच
बिहार की रंगमंचीय परंपरा की जड़ें उसके लोकजीवन में गहराई से जुड़ी हुई हैं। जट-जटिन, सामा-चकेवा और झिझिया जैसी लोक अभिव्यक्तियों में गीत, नृत्य, संवाद, कथा और सामूहिक सहभागिता का अनोखा मेल दिखाई देता है। इन परंपराओं ने ग्रामीण समाज को अपनी भावनाएँ, अनुभव और सामाजिक सरोकार व्यक्त करने का अवसर दिया। लोककलाओं की यही सहज और जीवनपरक शैली आगे चलकर आधुनिक रंगमंच के लिए आधारभूमि बनी। बिहार में मंच पर प्रस्तुत होने वाली अनेक कथाएँ सीधे आम लोगों के जीवन, उनकी समस्याओं और उनके सपनों से जुड़ी रही हैं।
भिखारी ठाकुर और ‘बिदेसिया’ की अमिट छाप
बिहार के रंगमंच की चर्चा भिखारी ठाकुर के बिना अधूरी मानी जाती है। भोजपुरी रंगमंच के इस महत्वपूर्ण लोक कलाकार ने समाज के उन वर्गों की आवाज़ को मंच तक पहुँचाया, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता था। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘बिदेसिया’ प्रवास, गरीबी, पारिवारिक विछोह, स्त्री की पीड़ा और सामाजिक असमानता जैसे विषयों को सामने लाता है। लोकभाषा, गीत, नृत्य और संवाद के माध्यम से भिखारी ठाकुर ने ऐसी कहानियाँ प्रस्तुत कीं, जिनमें दर्शकों को अपने जीवन की झलक दिखाई देती थी। ‘बिदेसिया’ की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में लोगों का अपने घरों और गाँवों से दूर जाना आज भी जारी है। ऐसे में इस नाटक में व्यक्त विरह, विस्थापन और पारिवारिक दूरी समकालीन संदर्भों में भी अर्थपूर्ण दिखाई देती है।
पटना में आधुनिक और प्रयोगधर्मी रंगमंच का विस्तार
बिहार का रंगमंच केवल लोकनाट्य तक सीमित नहीं रहा है। पटना ने आधुनिक और प्रयोगधर्मी रंगमंच के लिए भी एक महत्वपूर्ण वातावरण तैयार किया है। कालिदास रंगालय और प्रेमचंद रंगशाला जैसे मंचों ने नाटक, विचार-विमर्श और रंग प्रयोगों को स्थान दिया है। इसके अलावा अर्थशिला और हाउस ऑफ वेरायटी जैसे संस्थानों ने भी रंगमंच को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाने में भूमिका निभाई है। इन मंचों पर लोकजीवन से जुड़ी कथाओं के साथ-साथ समकालीन समाज की जटिलताओं को भी प्रस्तुत किया जाता रहा है। पटना में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकारों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों के बीच रंगमंच के प्रति रुचि को बढ़ाया है। इससे शहर में रंगकर्म के लिए एक ऐसा वातावरण बना है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद की संभावनाएँ दिखाई देती हैं।
NSD परिसर से प्रशिक्षण और रोजगार की नई संभावनाएँ
मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के नए परिसर की स्थापना की घोषणा को राज्य के रंगकर्मियों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह परिसर प्रभावी ढंग से विकसित होता है, तो बिहार के युवा कलाकारों को उच्चस्तरीय प्रशिक्षण के लिए राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता कम हो सकती है। अभिनय और निर्देशन के अलावा नाट्यलेखन, मंच-सज्जा, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि, तकनीकी संचालन और रंगमंच प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण की संभावनाएँ बन सकती हैं। इससे रंगमंच को केवल अभिनय तक सीमित देखने के बजाय एक व्यापक रचनात्मक और रोजगारपरक क्षेत्र के रूप में विकसित करने में मदद मिल सकती है।
लोककला, शोध और आधुनिक रंगभाषा का मेल जरूरी
एनएसडी परिसर की भूमिका केवल प्रशिक्षण देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बिहार की लोकनाट्य परंपराओं का दस्तावेजीकरण, शोध, अभिलेखन और आधुनिक संदर्भों में पुनर्व्याख्या भी इसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बन सकती है। लोककलाओं को केवल संग्रहालयों या पुराने दस्तावेजों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें आधुनिक रंगभाषा से जोड़ना आवश्यक है। इससे परंपरा जीवित भी रहेगी और नई पीढ़ी के कलाकारों को रचनात्मक प्रयोग का अवसर भी मिलेगा। विश्वविद्यालयों और रंगमंच संस्थानों के बीच सहयोग से नाट्यलेखन, लोक-संस्कृति, डिजिटल अभिलेखन, रंगमंच-अध्ययन और सांस्कृतिक प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में शोध तथा रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं।
संस्थान के साथ मजबूत सांस्कृतिक वातावरण भी जरूरी
किसी भी संस्थान की इमारत अपने आप रंगमंचीय संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकती। इसके लिए योग्य प्रशिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, अभिलेखागार, प्रदर्शन स्थल, शोध की स्वतंत्रता और स्थानीय रंगकर्मियों के साथ निरंतर संवाद आवश्यक होगा। यदि राष्ट्रीय स्तर की संस्थागत सुविधाओं और बिहार की लोक-सृजनशीलता के बीच संतुलित तालमेल स्थापित किया जा सके, तो पटना पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण रंगमंचीय केंद्र बन सकता है। बिहार का रंगमंच अपनी मिट्टी, लोकभाषा और सामाजिक अनुभवों से शक्ति प्राप्त करता है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उसकी परंपराओं को संरक्षित करते हुए नई पीढ़ी को प्रशिक्षण, मंच और अवसर उपलब्ध कराए जाएँ। एनएसडी परिसर की संभावित स्थापना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत बन सकती है और बिहार के रंगमंच को राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने की संभावना पैदा कर सकती है।


















