भाजपा:बिना राजा के दरबार और सिपाही, बस राजाज्ञा की प्रतीक्षा में ठिठकी सियासत!


रांची: झारखंड भाजपा इन दिनों एक ऐसे साम्राज्य की तस्वीर पेश कर रही है, जहां राजा तय नहीं है, सिपाही भ्रमित हैं, और दरबार हर रोज़ लग तो रहा है, मगर निर्णय शून्य है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी पिछले आठ महीने से खाली है, और पूरा संगठन अब “देखो… सोचो… रुको…” की रणनीति पर चलता दिखाई दे रहा है।

राजनीति के अनुभवी मुहावरे कहते हैं – “जहां राजा ही तय न हो, वहां दरबारियों की चुप्पी भी साजिश बन जाती है।” झारखंड भाजपा के मौजूदा हालात इस कहावत पर एकदम खरे उतरते हैं। अध्यक्ष के लिए कई नाम हवा में तैर रहे हैं – कोई खुद को रघुवर ‘राजनीति सिंहासन’ का दावेदार मान रहा है, तो कोई मनीष जायसवाल की प्रशासनिक पकड़ को आगे बढ़ाने की वकालत कर रहा है। वहीं पुराने खिलाड़ी रविंद्र राय और नए जोश वाले आदित्य साहू भी अपना-अपना तीर कमान में चढ़ाए बैठे हैं।

लेकिन असली समस्या ‘गुटबाज़ी की गहराई’ है।
हर खेमा अपने-अपने घोड़े पर सवार है, लेकिन दौड़ का बिगुल ही नहीं बज रहा। “जब तक संगठन के मंडल नहीं सधते, तब तक सिंहासन की सीढ़ी नहीं चढ़ती,” – भाजपा का संविधान यही कहता है। मगर इन 515 मंडलों में से आधे में भी चुनाव नहीं हो पाए हैं। संगठन जिलों की हालत भी वैसी ही है – “न नाव चली, न पतवार गिरी, बस मांझी की प्रतीक्षा में किनारे पर खड़ी राजनीति।”

कहीं नीयत में खोट, कहीं नीति में झोल!
फरवरी में चुनाव प्रक्रिया पूरी होनी थी, मगर अब जुलाई बीतने को है और नेताओं की ज़ुबान पर बस एक ही बात – “अभी ऊपर से आदेश नहीं आया है।” मानो दिल्ली की तरफ से कोई दिव्यदृष्टि मिलनी हो तभी संगठन की चेतना जागेगी।

इस बीच कार्यकर्ता मायूस हैं। वे पूछते हैं – “जब दरबार ही अनाथ हो गया हो, तो हम कौन से खेमे में ढाल रखें?” महाराष्ट्र में तो चुनाव भी हुआ, संगठन भी बना, और नया अध्यक्ष भी चुन लिया गया। लेकिन झारखंड में आज भी सियासी ‘उधारी की प्रतीक्षा’ चल रही है।

राजनीतिक चाणक्य नीति क्या कहती है?
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि झारखंड भाजपा में अब नेतृत्व का संकट “संगठनात्मक दुविधा” से ज्यादा “सियासी खींचतान” का नतीजा है। हर खेमा अपनी बिसात बिछाए है, लेकिन दिल्ली दरबार को यह डर है कि कोई गलत चाल बाद में भारी न पड़ जाए।

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी…
राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव सिर पर है। बाकी राज्यों में बाजी खेली जा चुकी है, लेकिन झारखंड की बारी में चुप्पी है। सवाल यह है – “क्या झारखंड फिर दिल्ली के इशारे का इंतजार करता रहेगा या अपना सियासी वजूद खुद तय करेगा?”

इस पूरे घटनाक्रम पर एक पुराना मुहावरा पूरी तरह फिट बैठता है –
“जहां गवैया बहुत हों, वहां सुर बेसुरा हो ही जाता है।”

और झारखंड भाजपा में फिलहाल सुर मिलाने वाला कोई राजा नज़र नहीं आ रहा है।


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