Cause OF Setback BJP in UP : केवल मोदी के नाम पर चुनाव जीतने का सपना देखने वालों ने डुबोयी नैया

वाराणसी / लखनऊ : Cause OF Setback BJP in UP केवल मोदी के नाम पर चुनाव जीतने का सपना देखने वालों ने भाजपा की नैया उसी यूपी में डुबोयी जहां से होकर दिल्ली की सत्ता का रास्ता जाता है। इस रास्ते को स्वाधीन भारत के पहले आम चुनाव से ही अहम माना जाता रहा है। इस रास्ते की अहमियत को सभी दलों के पुराने से लेकर नए सभी रणनीतिकार भी अच्छी तरह जानते हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए साल भर पहले से ही अमित शाह ने यूपी ने यूं ही डेरा नहीं डाला था। वह भी इस रास्ते की अहमियत को जानते थे और इसीलिए चुनाव की घोषणा होने पर 10 साल पहले उन्हीं को टिकट दिया जो संगठन हित में जनता के बीच भाजपा के लिए उम्दा बैटिंग अपने बूते कर सकें। लेकिन इस बार इसी बिंदु पर भाजपा के चुनावी रणनीतिकार वही पुराना पैमाना रखने में चूके और नतीजा सामने है।

भाजपा के टिकट बंटवारे में ही हुई बड़ी चूक

यूपी में लोकसभा की 80 सीटों के परिणाम भाजपा के हित में न होने के इसके पीछे कई कारण हैं। टिकट बंटवारे में गड़बड़ी के और पांच वर्षों तक सांसदों की निष्क्रियता तो इस परिणाम के मुख्य कारण रहे ही, जातीय समीकरण को पहचानने में भी भाजपा से चूक हुई। इसके चलते भाजपा उन सीटों पर भी चुनाव हार गई, जहां से उसे जीत की शत-प्रतिशत उम्मीद थी। दिल्ली की सत्ता का रास्ता आसान बनाने वाले उत्तर प्रदेश में इस बार के चुनाव में प्रत्याशियों के चयन को लेकर भाजपा में पूरे उत्तर प्रदेश में असंतोष नजर आया।

चुनावी रिजल्ट भाजपा को सदमे में डालने वाले रहे

प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटों के परिणाम भाजपा को सदमे में डालने वाले रहे तो इसके पीछे कई कारणों में उक्त प्रमुख हैं। टिकट बंटवारे में गड़बड़ी के और पांच वर्षों तक सांसदों की निष्क्रियता तो इस परिणाम के बुनियाद बन गए। टिकट वितरण में भी चूक हुई। मौजूदा 49 सांसदों को एनडीए ने चुनावी मैदान में उतारा। इनमें से ज्यादातर सांसदों ने पांच वर्षों तक अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं से दूरी बनाए रखी। वह केवल पीएम मोदी के नाम पर इस बार भी चुनाव जीतने का सपना देख रहे थे।

निर्वाचन क्षेत्र में राजनाथ सिंह और हेमामालिनी सरीखी दूसरे दिग्गज सक्रिय नहीं रहे

पीएम मोदी के संसदीय सीट से सटे चंदौली से डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय का नाम ऐसे प्रत्याशियों की सूची में सबसे टॉप पर है जिन्हें न चाहते हुए भी टिकट दिया गया कि पीएम मोदी के काम के नाम पर नैया पार लगा लेंगे। जौनपुर से कृपाशंकर सिंह को ऐन चुनाव के समय मुंबई की राजनीति से आयातित कर चुनावी टिकट दे दिया जाना भी चूक रही। उनका स्थानीय स्तर पर अपनी ही बिरादरी में विरोध रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संजीव बालियान को टिकट दिए जाने का जो विरोध शुरू हुआ था, उसका संदेश आसपास के क्षेत्रों में गया। इससे भाजपा को दो सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। रुहेलखंड के पीलीभीत में भाजपा के जितिन प्रसाद ने जीत दर्ज कर जरूर जैसे-तैसे सम्मान बचाया, लेकिन आसपास के सीटों पर मुस्लिमों के साथ पिछड़ों व दलितों ने सपा-गठबंधन को मजबूती दे दी। भाजपा के रणनीतिकार खुद बताते हैं कि मथुरा में हेमामालिनी की जीत इस बात का उदाहरण है कि मतदाताओं से यदि आप जुड़े हैं तो जनता आपके साथ है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की लखनऊ सीट भाजपा के लिए मजबूत मानी जाती रही है, लेकिन फैजाबाद में मतदाताओं का भाजपा को नकारना आश्चर्यजनक है।

राममंदिर मुद्दा नहीं बना, जमीनी हवा भांपने में चूकी भाजपा

लोगों की भावनाओं से जुड़े राम मंदिर के मुद्दे से भाजपा को काफी उम्मीदें थीं। अधिकतर सीटों पर प्रचार के दौरान राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा ने उठाया भी, लेकिन इसका चुनावी लाभ पार्टी को नहीं मिल सका। तमाम राजनीतिक दलों के रणनीतिकार जानते हैं कि यूपी में चुनावी मुद्दे क्षेत्रवार बदलते रहते हैं। साथ ही जातियों के समीकरण भी मुद्दों पर हावी होता गए। ऐसे में न राम मंदिर का प्रभाव देखने को मिला और न ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मुद्दा बन पाया।

यूपी में लोकसभा की 80 सीटों के परिणाम भाजपा के हित में न होने के इसके पीछे कई कारण हैं। टिकट बंटवारे में गड़बड़ी के और पांच वर्षों तक सांसदों की निष्क्रियता तो इस परिणाम के मुख्य कारण रहे ही, जातीय समीकरण को पहचानने में भी भाजपा से चूक हुई। इसके चलते भाजपा उन सीटों पर भी चुनाव हार गई, जहां से उसे जीत की शत-प्रतिशत उम्मीद थी।
फाइल फोटो

वोटरों से सीधे जुड़े कई अहम मसलों की अनदेखी पड़ी महंगी

चुनाव के दौरान भाजपा के रणनीतिकार यूपी में वोटरों से सीधे जुड़े कई अहम मसलों को छुआ तक नहीं जबकि उन्हीं मसलों को सपा और कांग्रेस ने अपने चुनावी वादों में लगातार अपडेट किया। इनमें सबसे पहला रहा – छुट्टा पशुओं की समस्या। देहातों में आवारा पशुओं के चलते फसलों को होने वाले नुकसान का कोई ठोस समाधान सरकारी तौर पर नहीं निकाला गया है। दूसरा मुद्दा पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस)  की रही। सरकारी कर्मी लगातार इसे लागू करने की मांग पर अड़े हैं लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। तीसरा मुद्दा शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का है जो बड़े स्तर पर समाज के निचले तबके पर में बड़े स्तर पर सीधा जुड़ा हुआ है। इसकी भी सरकारी स्तर पर लगातार अनदेखी हो रही है। चौथा किसानों का मसला और किसानों की हितो व भावनाओं की अनदेखी करना। पांचवां मसला सरकार में संगठन से जुड़े लोगों, कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के बातों या फीडबैक की अनदेखी। छठां कारण रहा – नए सरकारी कॉलेजों को खोला गया और उन्हें विश्वविद्यालयों से जोड़़ दिया गया जिसके चलते वहां सेल्फ फाइनेंस स्कीम में कोर्स चालू हुए जिसने युवाओं को परेशानी में डाला। 2000 रुपये जिस कोर्स की फीस सरकारी कॉलेज में होती है, वही सेल्फ फाइनेंस के तहत 10 से 20 हजार रुपये हो जाती है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रोफेसरों की सेवा की उम्र 65 की बजाय 62 किया जाना भी एक अहम कारण रहा है, इस बार भाजपा के खिलाफ अंडर करंट बनाने में।

सपा-कांग्रेस के काउंटर अटैक का काट नहीं ढूंढ़ पाई भाजपा

चुनाव के पहले चरण से ही पेपर लीक मामले को चुनावी मुद्दा बनाकर युवाओं को कांग्रेस व सपा ने अपने पक्ष में करना शुरू कर दिया था। इस मुद्दे को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित समूचे विपक्ष ने सातों चरणों में हर मौके पर उठाया। दूसरी ओर भाजपा ने इस मामले में अपना पक्ष रखने की भी जरूरत नहीं समझी। इसी क्रम एक खास बात और कि मुफ्त अनाज योजना सहित केंद्र की अन्य योजनाओं से मतदाता जरूर प्रभावित थे, लेकिन कांग्रेस ने पांच की बजाय 10 किलो अनाज मुफ्त में देने की घोषणा कर भाजपा को पीछे ढकेल दिया। सपा की आटा व डाटा मुफ्त देने की योजना का असर भी मतदाताओं पर हुआ। भाजपा इसकी काट भी नहीं ढूंढ़ पाई।

महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे ने बिगाड़ा भाजपा का खेल

कांग्रेस-सपा ने महंगाई व बेरोजगारी के मुद्दे पर भाजपा को घेरा। इसका जवाब भाजपा के पास नहीं था। जरूरी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के अलावा बेरोजगारों को नौकरी के मुद्दे पर भाजपा पलटवार न कर सकी। कांग्रेस ने 30 लाख बेरोजगारों को नौकरी देने का मुद्दा उठाया, जो भाजपा के खराब प्रदर्शन पर प्रभावी रहा। युवाओं में यह बड़ा फैक्टर बना और इसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ा। अग्निवीर योजना को भी विपक्ष बड़ा चुनावी फैक्टर बनाने में सफल रहा, जिसकी काट भाजपा नहीं ढूंढ़ पाई। विपक्ष की ओर से उछाले गए संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने के मुद्दे को भी भाजपा नहीं संभाल पाई।

फेल हुआ भाजपा का बूथ प्रबंधन, पन्ना प्रमुखों का प्रयोग रहा असफल

भाजपा ने बूथ प्रबंधन के प्रयास पहले शुरू किए थे, पर जमीनी स्तर पर यह उतर न सका। 1.60 लाख बूथों पर भाजपा ने प्रभारी तैनात किए थे। दूसरी ओर कांग्रेस सिर्फ 80 हजार बूथों पर प्रभारी तैनात कर पाई थी, लेकिन वे सक्रिय रहे। साथ ही भाजपा ने इस बार चुनाव जीतने के लिए पन्ना प्रमुखों की भी तैनाती की थी। वोटर लिस्ट के हिसाब से हर पन्ने का प्रभारी बनारी बनाया गया था। इस चुनाव में भाजपा का यह प्रयोग भी पूरी तरह से सफल नहीं साबित हुआ। अमित शाह से लेकर संगठन के स्तर पर पन्ना प्रमुखों से काफी उम्मीदें लगाई गईं थीं कि यह मैनेजमेंट चुनाव जीत का बड़ा हथियार साबित होगा, लेकिन प्रमुख लोगों को मतदान केंद्रों तक न ला सके।

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