“हेमंत सरकार की लापरवाही से संकट में जल, जंगल और जमीन”-Babulal Marandi…

Ranchi : झारखंड में जल, जंगल और ज़मीन की सुरक्षा को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी (Babulal Marandi) ने एक बार फिर हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि राज्य की प्राकृतिक धरोहरें सरकार की लापरवाही और भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ रही हैं।

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मरांडी ने गोड्डा ज़िले की कझिया नदी का उदाहरण देते हुए बताया कि 1990 के दशक में यह नदी सिंचाई परियोजना और पेयजल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत हुआ करती थी। लेकिन आज वही नदी अवैध बालू खनन की मार से दम तोड़ रही है। उन्होंने कहा कि नदी में बचा-खुचा बालू भी दिन-रात अवैध रूप से निकाला जा रहा है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।

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Babulal Marandi : अवैध खनन पर रोक जरुरी नहीं तो नदियों का अस्तित्व खत्म

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि जल्द ही अवैध खनन पर रोक नहीं लगी, तो न केवल कझिया, बल्कि गेरुआ, सुंदर और लिलझी जैसी अन्य जीवनदायिनी नदियाँ भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी। मरांडी ने सवाल उठाया कि जल, जंगल और ज़मीन की सुरक्षा की बातें करने वाली सरकार आखिर ज़मीनी स्तर पर क्या कर रही है?

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उन्होंने कहा कि इन नदियों और जंगलों का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यही प्राकृतिक संसाधन ग्रामीण क्षेत्रों की दैनिक ज़रूरतों को पूरा करते हैं-पीने का पानी, खेती की सिंचाई और आजीविका के साधन इन्हीं से जुड़े हुए हैं।

झारखंड को एक गहरे पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा

मरांडी ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “हेमंत सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा का जो दावा किया था, वह पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है। नदियों में अवैध खनन, जंगलों की अवैध कटाई और ज़मीन की बंदरबांट से साफ है कि इस सरकार की प्राथमिकता केवल वोट बैंक की राजनीति है, न कि राज्य की धरोहरों को बचाना।”

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उन्होंने प्रशासनिक तंत्र की चुप्पी और मिलीभगत पर भी सवाल उठाया। “क्या कारण है कि बालू माफिया दिन-दहाड़े खनन कर रहे हैं और पुलिस-प्रशासन आँखें मूंदे बैठा है? क्या यह बिना सत्ताधारी दल की शह के संभव है?”

बाबूलाल मरांडी ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने अब भी आंखें नहीं खोलीं, तो आने वाले समय में झारखंड को एक गहरे पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने राज्य की जनता से भी अपील की कि वे इस मुद्दे पर जागरूक बनें और अपनी नदियों, जंगलों और ज़मीन की रक्षा के लिए आवाज उठाएं।

 

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